विकास को तरसती कच्ची बस्तियां:टूटी सड़कें, गंदे नाले, बबूल की झाड़ियां और गंदगी के ढेर हैं यहां, मूलभूत सुविधाओं के अभाव में यहां जीना हुआ मुश्किल

जैसलमेर3 महीने पहले
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खुले नाले हादसे को देते न्यौता। - Dainik Bhaskar
खुले नाले हादसे को देते न्यौता।

शहर की कच्ची बस्तियां इन दिनों भगवान भरोसे हैं। प्रशासन की अनदेखी के चलते यहां के बाशिंदों का जीवन मूलभूत आवश्यकताओं के अभाव में नर्क के समान है। 1998 में प्लॉट आवंटन व 2004 की सर्वे के बाद आज तक यहां विकास नहीं हुआ है ना ही नियमन प्रक्रिया हुई है। जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते 25 से 30 वर्ष इन बस्तियों में रहने के बाद भी मालिकाना हक नहीं मिल पाया है। टूटी सड़कें, गंदे नाले, बबूल की झाड़ियां और गंदगी का आलम बस यही कुछ है इन कच्ची बस्ती वालों के भाग्य में। जैसलमेर में गफ़ूर भट्टा, पुलिस लाइन कच्ची बस्ती, रानीसर कच्ची बस्ती, बब्बर मगरा, पाक विस्थापितों की बस्ती आदि कच्ची बस्तियां शहर के आसपास के इलाकों में हैं।

जगह जगह गंदगी के ढेर।
जगह जगह गंदगी के ढेर।

टूटी सड़कें तकलीफदेह

शहर की कुल आबादी के लगभग 40% आबादी इन कच्ची बस्तियों में निवास करती है। नगर परिषद के क्षेत्र में होते हुए भी इन बस्तियों की व्यवस्था सीमावर्ती पिछड़े गांव जैसी है। आज भी इन बस्तियों में सड़कों का सफर आपको तकलीफ़देह साबित हो सकता है। जगह-जगह गड्ढों व कीचड़ के चलते पैदल राहगीरों के साथ ही वाहन चालकों का यहां से गुजरना दुश्वार हो गया है। शिक्षा की बात करें तो इस क्षेत्र में मात्र एक राजकीय व दो निजी विद्यालय हैं। इस क्षेत्र में कुल पांच वार्ड लगते हैं जिसकी आबादी लगभग 10 हजार से ज्यादा की है, लेकिन यहां केवल एक ही राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय है। एक तरफ राज्य सरकार जहां 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा के प्रावधानों को लेकर एड़ी चोटी से प्रयासरत है वही इन कच्ची बस्तियों के बच्चे आज भी शिक्षा क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं औऱ परिवार का पालन-पोषण करने के चलते अपना बचपन मजदूरी के बोझ में गंवाने को मजबूर हैं।

टूटी-फूटी सड़कों को मरम्मत का इंतज़ार।
टूटी-फूटी सड़कों को मरम्मत का इंतज़ार।

सीवरेज नहीं होने से गंदगी का आलम

सीवरेज यहां के लोगों के लिए आफत बनी हुई है। कुछ गलियों को छोड़ कर आज भी कई वार्ड ऐसे हैं जहां सीवरेज का काम नहीं हुआ है जिनसे लोगों को दूरदराज से पानी तो लाना ही पड़ता है। इसी के साथ-साथ जल निकासी में भी कई प्रकार की बाधाएं आती हैं। लोगों के घरों के आगे कीचड़ जमा होता हुआ दिखता है। 10 हजार की आबादी में फैले इस भूभाग में एक भी सार्वजनिक शौचालय नहीं है। वहीं इन कच्ची बस्तियों में आज भी कचरे का ढेर चारों और लगा दिखता है। वहीं दूषित वातावरण बीमारियों को न्योता देता नजर आता है। दूषित वातावरण में लोगों का जीना दुश्वार हो रहा है। लोगों का कहना है कि नगर परिषद द्वारा नियुक्त जमादार द्वारा भेजे गए कर्मचारी कुछ ब्लॉकों में ही सफाई के लिए जाते हैं। शेष वार्ड में सफाई कर्मचारी तक भी सफाई के लिए नहीं आते हैं वहीं प्रतिमाह सफाई कर्मचारियों के नाम पर पार्षद व जमादार हजारों का धन राज्य सरकार से बटोर रहे हैं।

सीवरेज के बिना गंदगी का आलम।
सीवरेज के बिना गंदगी का आलम।
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