बेटियों को मार देने का दाग अब धुल रहा:दो बच्चियों से राखी बंधवाने लाइन में लगते थे बच्चे-बुजुर्ग, अब शिक्षा-सुविधा पहुंची तो गांव में 100 से ज्यादा बेटियां

जैसलमेर5 महीने पहलेलेखक: मनोज कुमार पुरोहित
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अब एक ही परिवार में 8 बेटियां। - Dainik Bhaskar
अब एक ही परिवार में 8 बेटियां।
  • शौर्य के प्रतीक पोकरण से लगते गांवों पर बेटियों को मार देने का दाग अब धुल रहा है

जैसलमेर के पोकरण से लगते देवड़ा व झिनझिनयाली जैसे कई गांवों में 2001 तक दो-तीन बेटियां थीं। कहा जाता है कि यहां बेटियाें को जन्म लेते ही मार दिया जाता था। अब तस्वीर बदल गई है। आज इन गांवों में न सिर्फ 100 से ज्यादा बेटियां हैं बल्कि कई बड़े पदों कर कार्यरत हैं।

भास्कर ने इन गांवों में पड़ताल की तो पता चला कि देवड़ा में 120 साल तक बारात नहीं आई थी। 7 मई, 1998 को इंद्रसिंह भाटी की बेटी जयंत कंवर की गांव में पहली बारात आई। यह शादी देश में चर्चा का विषय बनी। इससे पहले 1890 में देवड़ा में किसी बेटी की डोली उठी थी। गांवों में रक्षाबंधन पर सामुदायिक भवनाें में आयोजन होता, जहां राखी बंधवाने के लिए सैकड़ों लोगों की लाइन लगती थी।

परिवारों की वार्षिक आमदनी 5 हजार, शादियों पर भारी खर्च के कारण नहीं बढ़ती थी बेटियां

बेटी की शादी में टीके की परंपरा पर बड़ी राशि खर्च होती थी। गांव के 76 वर्षीय पूर्व शिक्षक रेवत सिंह ने बताया कि गांवों में स्कूल नहीं थे। प्रसव तक की सुविधा नहीं थी। बेटियां मार दी जाती तो पता नहीं चलता था। देवड़ा में शिक्षक गिरधारी लाल ने बताया कि स्थिति सुधरी है लेकिन आज भी बेटियों को पढ़ाने पर ध्यान नहीं दे रहे।

फिर वर्षों बाद एक शादी से गए अच्छे संदेश व शिक्षक-सरपंच बनने से बेटियों की चाहत बढ़ी

गांव में दामाद आता है तो भव्य स्वागत होता है। इससे बेटियाें की चाहत बढ़ी। देवड़ा के पूर्व सरपंच पन्ने सिंह बताते हैं कि बेटी सुगन की 2010 में शादी हुई। यह 120 साल में दूसरी बारात थी। सरपंच पवन कंवर बोलीं कि चुनावों में महिला आरक्षण व्यवस्था 2005 में शुरू हुई। आज कई गांवों में महिला सरपंच या प्रधान है।