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ज्यादा वजन से हाइटेंशन तारों से टकराते हैं गोडावण:ओवरहेड पॉवर लाइन गोडावण के लिए खतरा, सोलर प्रोजेक्ट के तहत विचरण क्षेत्र में बिछ रहा मौत का जाल

जैसलमेर3 दिन पहले
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जैसलमेर. देगराय ओरण क्षेत्र में बिछाई जा रही ओवरहेड पॉवर ट्रांसमिशन लाइन। - Dainik Bhaskar
जैसलमेर. देगराय ओरण क्षेत्र में बिछाई जा रही ओवरहेड पॉवर ट्रांसमिशन लाइन।
  • तारों की चपेट में आने से तीन साल में छह गोडावण मर चुके
  • सुप्रीम कोर्ट की रोक, फिर भी बिछ रहा है तारों का जाल
  • एक ओर संरक्षण तो दूसरी तरफ लापरवाही

लुप्त प्राय राज्य पक्षी गोडावण की संख्या लगातार कम हो रही है, बावजूद इसके जिम्मेदार लापरवाही बरत रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की रोक के बावजूद गोडावण विचरण इलाकों में बिछ रहे तारों के जाल यही बता रहे हैं कि गोडावण संरक्षण को लेकर गंभीरता नहीं बरती जा रही है।

हाल ही में जिले के कई इलाकों में सोलर प्लांट लग रहे हैं, इनमें कई इलाके ओरण क्षेत्र भी है और गोडावण के विचरण इलाके भी। बावजूद इसके बिना रोक टोक के ओवरहेड पॉवर लाइनें लगाई जा रही है।

अप्रैल माह में सुप्रीम कोर्ट ने डीएनपी व उसके आसपास के इलाकों में बिछी ओवरहेड पॉवर लाइन को अंडरग्राउंड करने या फिर जो लाइन अंडरग्राउंड नहीं हो सकती, उन पर बर्ड डायवर्टर लगाने का आदेश दिया था। इतना ही नहीं नई लाइन लगाने पर भी रोक है।

जानकारी के अनुसार इन दिनों जिले भर में अच्छी बारिश हो रखी है। जिसके चलते गोडावण भी अपने विचरण स्थल से बाहर निकल रहे हैं। गोडावण का वजन ज्यादा होता है। हवा में उड़ते वक्त अचानक तारें सामने आने पर वह मूवमेंट नहीं कर पाते और तारों से टकरा जाते हैं। वजन ज्यादा होने के चलते अन्य पक्षियों की तुलना में गोडावण तारों की चपेट में ज्यादा आते हैं।

लगातार कम हो रही है राज्य पक्षी गोडावण की संख्या, सरकार खुद ही इसकी जिम्मेदार

वर्ष 1970 में 1200 से अधिक गोडावण थे। लगातार संख्या कम होती रही और आखिरी गणना 2017 में इनकी संख्या 100 के करीब रह गई। इस दौरान गोडावण संरक्षण पर भी करोड़ों रुपए खर्च हुए लेकिन गोडावण का संरक्षण नहीं हो पाया।

\इस बीच पाॅवर लाइनें भी इनके लिए मुसीबत बनी हुई है। पिछले तीन सालों में तारों की चपेट में आने से छह गोडावण की मौत हो चुकी है। जानकारी के अनुसार सोलर प्लांट को सरकार की तरफ से ही जमीन आवंटित की जा रही है।

ऐसे में जमीन आवंटन के समय किसी तरह की अंडरग्राउंड केबलिंग की शर्त भी नहीं रखी जा रही है। जिसके चलते कंपनियां अपनी मनमर्जी से लाइनों का जाल बिछा रही है। प्लांट के लिए जमीन आवंटन का काम पूरी तरह से सरकार व प्रशासन की ओर से किया जाता है।

पिछले कई सालों से गोडावण संरक्षण के प्रयास चल रहे हैं और करोड़ों रुपए भी खर्च किए जा चुके हैं। गोडावण के लिए जैसलमेर व बाड़मेर जिले में 3162 वर्ग किमी का एरिया डीएनपी के लिए रिजर्व है।

इस क्षेत्र में रहने वालों को विकास भी नसीब नहीं हो रहा है। दूसरी तरफ लापरवाही यह कि बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए काम कर रही कंपनियां ओवरहेड पॉवर ट्रांसमिशन लाइनें बिछा रही है जो कि गोडावण के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

कमेटी ने लाइनों पर बर्ड डायवर्टर लगाने के निर्देश दिए थे

  • जैसलमेर से रामगढ़ 1 व 2 दोनों लाइनें 40 किलोमीटर।
  • पोकरण से आसकंद्रा से एक लाइन 30 व दूसरी 20 किमी।
  • अमरसागर-रामगढ 40 किमी
  • अमरसागर- लीलो 08 किमी
  • अमरसागर - फलोदी 54 किमी
  • अमरसागर - फलोदी 71 किमी
  • रामगढ़ - देचू की तीन अलग अलग लाइनें।
  • आकल - रामगढ़ 55 किमी।
  • तेजुआ - कुछड़ी 138 किमी।
  • कालेडूंगर - 70 किमी।
  • मोकला - हाबूर - सोनू 301 किमी।
  • तेजुआ - कुछड़ी 25 किमी।
  • मोकला - हाबूर - सोनू 132 केवी 43 किमी।
  • चांधन - मोहनगढ़ 70 किमी।
  • अमरसागर - रामगढ़ 40 किमी।
  • अमरसागर - लौद्रवा 04 किमी।

अंडरग्राउंड करने के निर्देश थे

  • कन्नोई - सलख 21 किमी।
  • सम - धनाना 35 किमी।​​​​​​​
  • तेजुआ - कुछड़ी 17 किमी।
  • कुछड़ी 33 केवी लाइन 21 किमी।​​​​​​​

कमेटी की इजाजत जरूरी​​​​​​​

सुप्रीम कोर्ट ने गोडावण विचरण क्षेत्र सहित डीएनपी के आसपास इलाकों में बिजली की लाइनें लगाने से पहले एक कमेटी से स्वीकृति का आदेश भी दिया था। कोर्ट ने ही कमेटी का गठन किया था। जिसमें रिन्यूबल एनर्जी मंत्रालय के डॉ. राहुल रावत, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट के डॉ. सुत्रिथा दत्ता व द कोरबेट फाउंडेशन के डॉ. देवेश गढवी शामिल है। ​​​​​​​

आदेशों की हो रही अवहेलना​​​​​​​

जिले के विभिन्न इलाकों में लग रहे सोलर प्लांट के तहत बिछाई जा रही ओवरहेड पॉवर लाइनें गोडावण के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी है, साथ ही अंडरग्राउंड केबलिंग संभव नहीं होने पर कमेटी से परमिशन भी जरूरी है लेकिन यहां पर निर्देशों की पालना नहीं हो रही है। फिलहाल बिछाई जा रही लाइनें कोर्ट के आदेशों की अवहेलना है। -कपिल चंद्रवाल, डीएफओ, डीएनपी​​​​​​​

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