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जलवायु परिवर्तन:मौसम में नमी ज्यादा होने सेे गर्म हवा ऊपर उठकर तूफान का रूप लेती है, फिर पाक के रास्ते जैसलमेर में होता है प्रवेश

जैसलमेरएक महीने पहले
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  • जलवायु में परिवर्तन के कारण सीजन में तीन बार जैसलमेर आ चुके हैं तूफान
  • हवा की गति 40 किलोमीटर से अधिक होने पर ये धूल के कण बवंडर का रूप धारण कर लेते हैं

मरुस्थलीय इलाकों में रेतीले तूफान आना आम बात है लेकिन इस बार जलवायु परिवर्तन ज्यादा देखने को मिल रहा है, इस वजह से तूफान ज्यादा आ रहे हैं। जैसलमेर जिले में इस बार तीन बड़े तूफान आ चुके हैं और सामान्य आंधी तो कई बार आती है। पहला तूफान 21 से 23 मार्च के बीच आया, इस दौरान हवा की गति 70 किमी प्रति घंटा रही। उसके बाद ताउते का असर 25 व 26 जून को देखा गया। वहीं हाल ही में 15 जून को भी 50 से 60 किमी रफ्तार से तूफान दर्ज किया गया।

अतुल गालव कृषि मौसम वैज्ञानिक ,कृषि विज्ञान केन्द्र, जैसलमेर ने बताया कि जिले में ज्यादातर तूफान मार्च से जून माह के बिच सवह्नी गतिविधियों मे बढ़ोतरी होने के कारण आते हैं। इसके साथ ही उन्होंने बताया की इन महीनों मे वातावरण में नमी की मात्रा बहुत कम होती है जो तूफ़ान बनने के अनुकूल होती है। इसके साथ ही इन दिनों वर्षा मानसून की अपेक्षा कम होने के साथ मेघगर्जना की संभावना ज्यादा रहती है। इस दौरान सरहदी क्षेत्र के लोगों एवं किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए। पाकिस्तान से तूफान आने की वजह यह है कि वहां नमी ज्यादा है जिसके चलते गर्म हवा ऊपर उठकर तूफान का रूप ले लेती है। बाद में जिस दिशा में गर्मी ज्यादा रहती है हवा की दिशा उस दिशा में ही रहती है। इस वजह से जैसलमेर में तूफान अधिक आते हैं।

हवा की गति 40 किमी होने से उठते तूफान

उन्होंने बताया की विश्व में ज्यादातर रेगिस्तान भूमध्य रेखा के इर्द-गिर्द है। इस क्षेत्र में वायुमंडलीय दबाव बहुत अधिक होता है। यह दबाव उंचाई पर मौजूद ठंडी शुष्क हवा को जमीं तक लाता है। इस दौरान सूरज की सीधी किरणें इस हवा की नमी को समाप्त कर देती है और यह हवा बहुत गर्म हो जाती है। इसी वजह से बारिश भी नहीं हो पाती है। बाद में यह हवा बहुत ही आसानी से ऊपर उठना शुरू कर देती है। हवा की गति 40 किलोमीटर से अधिक होने पर ये धूल के कण बवंडर का रूप धारण कर लेते हैं। उन्होंने बताया की कभी यहां 120 किमी प्रति घंटा के तूफान भी देखने को मिलते हैं।

मानसून आने के साथ ही तूफान की संभावना खत्म हो जाती है

वैज्ञानिक गालव के अनुसार मानसून के साथ ही तूफान की संभावना कम हो जाती है। ये तूफान गर्मी ज्यादा होने के साथ साथ जलवायु परिवर्तन की वजह से आते हैं। जब मानसून शुरू होता है और बारिश आने के बाद गर्म हवा जमीन पर नहीं होती जिससे तूफान नहीं बनते। आगामी दिनों में तूफान की संभावना कम है।​​​​​​​

ऐसे बनते हैं तूफान

उन्होंने बताया कि इस साल ज्यादा तूफान आने का कारण जलवायु परिवर्तन है। बढ़ती हुई ग्रीन हाउस गैसों का जलवायु परिवर्तन में मुख्य योगदान है। ग्रीन हाउस गैसों के अंदर सबसे ज्यादा योगदान कार्बन डाई ऑक्साइड का (52%) होता है। जलवायु परिवर्तन के आंकड़े निकालने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी आईपीसीसी के अनुसार वातावरण मे कार्बन डाई ऑक्साइड की उत्सर्जन दर बढकर 0.003% से बढकर 0.004% हो गई है जो की चिंता का विषय है। ग्रीन हाउस गैसों की वजह से समुद्र की सतह का तापमान भी बढ़ा है। आईपीसीसी के अनुसार 20वीं शताब्दी के दौरान समुद्र की सतह के तापमान में वृद्धि हुई और इसमें वृद्धि जारी है, 1901 से 2020 तक, तापमान 0.14 डिग्री फारेनहाइट प्रति दशक की औसत दर से बढ़ा है। समुद्र ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से अधिकांश अतिरिक्त गर्मी को अवशोषित करता है, जिससे समुद्र के तापमान में वृद्धि होती है। समुद्र के बढ़ते तापमान की वजह से ही इस बार यास एवं ताउते जैसे दो तूफान आए।

चक्रवाती तूफान तब ही आते हैं जब समुद्र की सतह का तापमान 26 डिग्री से अधिक होता है। इसके साथ ही जैसलमेर जिले में भी ज्यादा तूफान आने का कारण जलवायु परिवर्तन है क्योंकि यहां का ज्यादातर इलाका बंजर एवं रेत से ढका हुआ है और रेत जल्दी गर्म होती है जिससे यहां उपस्थित गर्म हवा हल्की होने के कारण हवा में उपर उठती है और एक निश्चित उंचाई पर संघनित होकर एक तूफ़ान का रूप धारण कर लेती है।​​​​​​​

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