सहुलियत / ऋण स्थगन सुविधा महंगी, किस्त चुकाना फायदेमंद

Loan suspension facility is expensive, installment repayment beneficial
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Loan suspension facility is expensive, installment repayment beneficial

  • छह माह तक राेकी किस्त पर लगेगा ब्याज, कर्जधारक के पास होंगे विकल्प, चाहे तो एक साथ ब्याज भर दें

दैनिक भास्कर

May 24, 2020, 07:25 AM IST

जैसलमेर. ऋण स्थगन (मोराटोरियम) की अवधि में एक बार फिर तीन महीने की छूट मिलने से तत्काल ताे राहत मिल रही है लेकिन आगे चलकर आर्थिक रूप से यह काफी नुकसानदेय साबित हाेगी। आरबीआई ने दूसरी बार माेराटाेरियम की अवधि बढ़ाकर 31 अगस्त,कर दी है। अब आपको  टर्म लोन की किस्तों का भुगतान अगले 3 महीने तक नहीं करना होगा, लेकिन अगर आप इस मोराटोरियम का लाभ लेते हैं तो आपको इसके लिए अतिरिक्त ब्याज चुकाना होगा। 
अतिरिक्त बोझ बढ़ेगा
आरबीआई गवर्नर ने साफ कहा कि लोन मोराटोरियम का मतलब ईएमआई वेबर नहीं है। वहीं उन्होंने कहा कि ईएमआई टालने पर 6 महीने के संचित ब्याज को अब टर्म लोन में बदला जा सकता है। यानी इस ब्याज पर ग्राहकों को ब्याज देना होगा।  इसका मतलब है कि 6 महीने बाद जो ईएमआई शुरू होगी, उसकी रकम बढ़ी होगीया कुल ईएमआई की संख्या बढ़ जाएगी। यह ग्राहक काे तय करना हाेगा कि वह काैन सा विकल्प ग्राहक लेना चाहता है।
छह महीने बाद बैंक वसूलेंगे, चक्रवर्ती ब्याज देय
ज्यादातर बैंकों ने पहले ​ही कह दिया था कि इस बारे में घोषित योजना के अनुसार वे मोराटोरियम पीरियड के बाद इन 6 महीनों का ब्याज बाद में वसूलेंगे। इसका मतलब हुआ कि लोन लने वालों के सामने दोहरी समस्या है। बहुत से लोग ऐसे हें, जिनकी लॉकडाउन की वजह से आय प्रभावित हुई है।

वहीं दूसरी ओर अगर वे आबीआई के लोन मोरेटोरियम की सुविधा लेते हैं तो उनकी ईएमआई की रकम बढ़ेगी या ईएमआई की संख्या पहले के मुकाबले बढ़ जाएगी। 
किस्त की अवधि भी बढ़वा सकते हैं
अगर आपने मोराटोरियम यानी मोहलत के विकल्‍प को चुना है तो आपको 6 महीने ईएमआई (मार्च, अप्रैल, मई, जून, जुलाई और अगस्त) नहीं देना है। इन छह महीनों की किस्‍तों पर जुटे ब्याज को आपको देना है। अगर आपने ईएमआई के पेमेंट में मोराटोरियम को चुना है तो बैंक आपको तीन विकलल‍प दे सकते हैं।

इसमें पहला विकल्प मोराटोरियम की अवधि खत्‍म होने के बाद जुटे हुए ब्याज का एकमुश्त भुगतान।  दूसरा बचे हुए लोन में ब्याज को जोड़ा जाए और लोन की बाकी अवधि में ईएमआई की रकम बढ़ाई जाए और बकाया लोन में जुटे ब्याज को जोड़ा जाए और किस्त की वही रकम रखते हुए लोन की अवधि बढ़ा दी जाए। तीनाें ही स्थिति में भार कर्जदाताओं पर ही पड़ेगा।

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