आपदा की चिंता नहीं, अफसरों की सेवा जरूरी:जिम्मेदारी आपदा में लोगों की जिंदगी बचाने की सिविल डिफेंस के स्वयंसेवक बजा रहे अफसरों की हाजरी

जैसलमेर2 महीने पहले
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कलेक्ट्रेट परिसर में पार्किंग व्यवस्था में लगे और एडीएम कार्यालय में फाइलें ले जाता स्वयंसेवक। - Dainik Bhaskar
कलेक्ट्रेट परिसर में पार्किंग व्यवस्था में लगे और एडीएम कार्यालय में फाइलें ले जाता स्वयंसेवक।
  • ये कैसा आपदा प्रबंधन;कोई एसडीएम के घर खाना बनाता है तो कोई पार्किंग की व्यवस्था संभाल रहा

सिविल डिफेंस के स्वयंसेवक की जिम्मेदारी आपदा की स्थिति में लोगों की जिंदगी बचाना है, लेकिन जिले में डिफेंस के स्वयंसेवक अफसरों के घर ड्यूटी कर रहे हैं। कोई कलेक्टर के बंगले में काम कर रहा है तो कोई एसडीएम के गाड़ी चलाने के साथ खाना पका रहा है। इतना ही नहीं पांच स्वयंसेवक तो कलेक्ट्रेट में पार्किंग व्यवस्था संभाले हैं। एक दिन पूर्व ट्रांसपोर्ट नगर चौराहे पर हुई घटना के दौरान सिविल डिफेंस की पोल खुलकर सामने आ गई। भास्कर ने जब इस मामले की पड़ताल की तो चौंकाने वाली हकीकत सामने आई।

बड़ी बात तो यह है कि इन स्वयंसेवकों को रोटेशन के अनुसार ड्यूटी दी जाती है लेकिन अधिकारियों के घरों में व कार्यालयों में लगे स्वयंसेवक स्थाई तौर पर लगे हुए हैं, इसके चलते अन्य स्वयंसेवकों में रोष है और रोटेशन में उनका नंबर बहुत ज्यादा देरी से आता है। भास्कर पड़ताल में एक और चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया कि प्रशिक्षण के नाम पर कुछ नहीं है, संसाधनों की भी कमी है। जहां भी कोई घटना होती है वहां इनकी टीम पहुंच तो जाती है लेकिन कर कुछ नहीं पाती। हालांकि आग के मामले में सिविल डिफेंस कुछ हद तक राहत देने वाली साबित होती है। जानकारी के अनुसार पिछले कुछ सालों में आपदा से संबंधित जितने भी मामले हुए हैं वहां प्रशासन, नगरपरिषद, सेना व बीएसएफ की टीमें ही काम आई है। उदाहरण के तौर पर बरमसर की बरसाती नदी में कई बार लोग बह गए हैं लेकिन उन्हें निकालने में या तो ग्रामीणों ने सहयोग दिया या फिर बीएसएफ ने मोर्चा संभाला।

एक भी गोताखोर नहीं, संसाधनों के नाम पर रस्सियां व फावड़े ही है

बरसात के दिनों में चलने वाली नदियों में कई लोग डूब जाते है। तालाबों में डूबने की घटनाएं होती रहती है। वहीं नहरी क्षेत्र में नहर में डूबने की कई घटनाएं सामने आ चुकी है। लेकिन इन घटनाओं के दौरान सिविल डिफेंस रेस्क्यू नहीं करती है। क्योंकि सिविल डिफेंस के पास गोताखोर ही नहीं है। टीम में सिर्फ तैराक शामिल है। जो सिर्फ तैरना ही जानते है। इनके पास खुद को सुरक्षित रखते हुए डूबे लोगों को बचाने व शवों को निकालने का प्रशिक्षण ही नहीं है। आपदा की स्थिति में रेस्क्यू के दौरान काम में लिए जाने वाले संसाधन भी सिविल डिफेंस के पास उपलब्ध नहीं है। सिर्फ रस्से व फावड़ों से रेस्क्यू नहीं किया जा सकता है। नदी तालाबों व नहरों में रेस्क्यू के लिए सिविल डिफेंस के पास नाव होनी चाहिए। जो नहीं है। नाव के पीछे लगने वाली मशीन भी नहीं है। डीप ड्राइविंग सेट जिसमें ऑक्सीजन का सिलेंडर होता है वो भी इनके पास नहीं है। पानी निकालने के लिए पंप मोटर नहीं है।

प्रशिक्षण देने वाले सीडीआई का पद रिक्त

पिछले कई वर्षों से सिविल डिफेंस में सीडीआई का पद रिक्त है। वालिंटियर को आपदा के दौरान कैसे काम करना है इसका प्रशिक्षण भी नहीं मिला है। स्वयंसेवक को ये भी जानकारी नहीं है कि पानी में उतरने से पहले रस्से में कैसे गांठ लगाई जाती है। स्वयंसेवक को तैराकी, आगजनी व प्राकृतिक आपदा के दौरान चलाए जाने वाले रेस्क्यू का प्रशिक्षण दिया जाता है। लेकिन ऐसा यहां पर कुछ नहीं है क्योंकि प्रशिक्षक का पद ही रिक्त चल रहा है। बिना प्रशिक्षण के स्वयंसेवकों को भी जान का खतरा है।

डीक्यूआरटी टीम सेवा छोड़ अधिकारियों की सेवा में लगी

आपातकालीन स्थिति में मौके पर पहुंचने वाली डीक्यूआरटी की पूरी टीम अधिकारियों की सेवा व कलेक्ट्रेट परिसर की व्यवस्था में लगी हुई है। इस टीम में 12 वालिंटियर शामिल है। जिनका काम दुर्घटनाओं व आपातकालीन स्थिति में सबसे पहले माैके पर पहुंचकर राहत कार्य करना है। लेकिन इस टीम के सभी सदस्य या तो अधिकारियों के घर पर या फिर कार्यालय में ड्यूटी दे रहे हैं। इसके अलावा बाढ़ नियंत्रण कक्ष में 24 वालिटिंयर 8-8 की 3 शिफ्टों में लगे हुए हैं। लेकिन दिन में एक भी स्वयंसेवक बाढ़ नियंत्रण कक्ष में मौजूद नहीं रहता है। कई स्वयंसेवक यहां सिफारिश पर लगे हुए हैं। जो काम पर नहीं आते और मानदेय उठाते हैं।

एसडीएम से भास्कर की बात

भास्कर: सिविल डिफेंस के पास संसाधनों की कमी है। जवाब: मैंने हालही में ज्वॉइन किया है, संसाधनों की कमी को लेकर प्लानिंग की जाएगी, जल्द ही बेहतर व्यवस्था की जाएगी। भास्कर: आपके घर पर कितने वॉलिंटियर लगे हुए हैं। जवाब: लोग बता रहे हैं तो हम क्या कर सकते हैं। मेरे घर पर तो एक भी वॉलिंटियर्स नहीं लगा हुआ है। भास्कर: कलेक्टर के बंगले पर कितने हैं ? जवाब: मैं वहां देखने नहीं गया, इसलिए मुझे जानकारी नहीं है। भास्कर: क्या ये स्वयंसेवक अधिकारियों के घरों पर काम कर सकते हैं? जवाब: नहीं, इनकी ड्यूटी चार्ट में नहीं है।​​​​​​​

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