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सेवण घास:कम दिखती है किंग ऑफ डेजर्ट के नाम से मशहूर सेवण घास, पशुओं का मुख्य आहार

लाठी8 महीने पहले
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  • अतिक्रमणों के कारण सिकुड़ रहे है चारागाह, ट्रैक्टरों से खेती बढ़ने के बाद सेवण घास कम
  • दस साल तक स्टोर करने के बाद भी नहीं खराब होती, पशुओं के लिए कारगर

गांव के आसपास के गांव धोलिया, भादरिया, सोढाकोर, डेलासर, भादरिया पर स्थित धोरों पर लहलहाने वाली सेवण घास अब विलुप्त होने के कगार पर है। किंग ऑफ डेजर्ट के नाम से मशहूर यह घास मरुस्थल में वर्षों पूर्व पशुधन का मुख्य आहार रही हैं। इसके सिमटते दायरे का प्रभाव पशुधन के स्वास्थ्य पर स्पष्ट दिखाई देने लगा हैं। जानकारों के अनुसार सेवण घास पशुधन के लिए सबसे पौष्टिक आहार होता हैं, लेकिन इसकी उपलब्धता दिनोंदिन दुर्लभ होती जा रही हैं।

सेवण घास के प्रति सरकार किसानों की उदासीनता के चलते धीरे-धीरे यह अपना वजूद खोती जा रही हैं। वर्षों पूर्व ओरण, गोचर चारागाहों में सेवण घास बहुतायत में पाई जाती थी। खेती करने में आधुनिक मशीनरी का चलन बढ़ने के साथ ही जहां पैदावार बढ़ी हैं, वहीं सेवण घास को इससे नुकसान भी हुआ है।

वर्तमान में मशीनरी से बुवाई करने से साल दर साल सेवण घास अन्य खरपतवार की जड़ें समाप्त होती जा रही हैं। साथ ही खेती का दायरा भी विस्तृत होता जा रहा हैं और दिनोंदिन हो रहे अतिक्रमणों के कारण सिकुड़ते चारागाह रही सही कसर पूरी कर रहे हैं। पशुपालक बताते हैं कि पूर्व में सेवण घास के बहुतायत में होने से वर्षपर्यंत पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करने की दिक्कत नहीं थी,मगर अब स्थितियां इसके ठीक उलट हो गई हैं। 

करोड़ों रुपए खर्च फिर भी नहीं बचा सके
सेवण घास की उपयोगिता को देखते हुए केंद्र व राज्य सरकार ने विगत सालों में इसके संरक्षण के लिए प्रयास भी शुरू किए हैं। लेकिन ये प्रयास प्राकृतिक रूप से बने मैदानों में नहीं होने से पूरी तरह से सफल नहीं हो पा रहे हैं। सेवण को बचाने के लिए वन विभाग, कृषि अनुसंधान विभाग कृषि विभाग अब तक करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी वो सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं,जो वर्षों पूर्व प्रकृति हमें निशुल्क प्रदान करती थी।

खत्म होने के कारण-केंद्रीय रूक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के शोध में यह बात सामने आई कि इंदिरा गांधी नहर के आने भूजल स्तर के बदलाव से खुदवाए गए नलकूपों के बाद यहां की मिट्टी आद्र्र हो गई। ट्रैक्टर चलने से सेवण घास का पौधा जड़ सहित उखड़ने लगा। 

अनदेखी से बने ये हालात 
लाठी सहित धोलिया,भादरिया, सोढाकोर,डेलासर,लोहटा,रतन कि बस्सी सहित आसपास के क्षेत्रों में सेवण के सिमटते दायरे का कारण सेवण की उपयोगिता की अनदेखी करने को माना जा रहा हैं। शुष्क क्षेत्रों में पाई जाने वाली सेवण घास चारागाहों की अनदेखी के चलते इस घास का एरिया अब बहुत कम बचा हैं।

पूर्व में पशु आधारित खेती जीवनयापन का मुख्य स्रोत थी, लेकिन अब प्राकृतिक रूप से उगे घास के मैदानों में भी व्यापारिक खेती का प्रचलन शुरू होने के बाद से सेवण घास के चारागाहों का दायरा दिन दिन सिमटता जा रहा हैं। 
क्यों कहते हैं किंग ऑफ डेजर्ट 
रेगिस्तान में वनस्पति बहुत ही कम मिलती हैं, जो भी होती हैं वो कंटीली होती हैं। पोषण लायक वनस्पति नहीं होने से रेगिस्तान में दूर-दूर तक जीव नहीं मिलते हैं। लेकिन सेवण घास सामान्य घास की तरह हरी पौष्टिक होती हैं। यह दस साल तक भंडारण करके रखने के बावजूद तो खराब होती हैं और ही इसके पोषक तत्वों में कमी आती हैं। इसलिए वनस्पतिशास्त्री इसे किंग ऑफ डेजर्ट नाम से पुकारते हैं। 
बहुपयोगी हैं सेवण घास 
एकबार पनपने के बाद ‘बूठें’ का स्वरूप ले लेता हैं। जो कि अनंत काल तक शुष्क क्षेत्र में पौष्टिक स्वादिष्ट चारे का उत्पादन देने में सक्षम होता हैं। यह घास रेगिस्तानी क्षेत्र में पालतू पशुओं गाय, भैंस, भेड़, बकरी,ऊंट वन्य पशुओं का प्रकृति जन्य पौष्टिक आहार हैं।

अकाल के समय पोषक तत्वों के स्रोत के रूप में सेवण घास दुधारू पशुओं के लिए वरदान हैं, क्योंकि इस घास में 7 से 11 प्रतिशत प्रोटिन की मात्रा उनकी तात्कालिक जरूरतों को पूरा करती हैं। सेवण को काटकर ‘हे ‘साईलेज’ बनाकर पोषक तत्वों में कमी लाए बिना कई वर्षों तक उपयोग में लिया जा सकता हैं।

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