बाॅर्डर के अंतिम गांव से ग्राउंड रिपोर्ट:15 किमी दूर नर्मदा नहर फिर भी नहीं पहुंचा मीठा पानी, 50% लोग पलायन कर चले गए गुजरात

बाड़मेर18 दिन पहलेलेखक: भवानीसिंह राठौड़/नरपत रामावत
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भारत-पाक बॉर्डर के अंतिम गांव बाखासर के तारीसरा गांव में 45 डिग्री तापमान में पानी के भयंकर संकट के बीच पानी की एक मटकी के लिए बेरी से पानी सींचने को लेकर जद्दोजहद करती ग्रामीण महिलाएं व युवतियां। - Dainik Bhaskar
भारत-पाक बॉर्डर के अंतिम गांव बाखासर के तारीसरा गांव में 45 डिग्री तापमान में पानी के भयंकर संकट के बीच पानी की एक मटकी के लिए बेरी से पानी सींचने को लेकर जद्दोजहद करती ग्रामीण महिलाएं व युवतियां।

भारत-पाक बॉर्डर पर बाखासर क्षेत्र के भलगांव ग्राम पंचायत के तारीसरा गांव में पानी के लिए मची त्राही-त्राही के बीच पचास फीसदी लोग गांव से पलायन कर गुजरात चले गए है। अब कई ढाणियों में वीरानगी छाई हुई नजर आ रही है। हालांकि गांव के एक हिस्से की ढाणियों में पचास फीसदी लोग निवासरत है। उनके सामने भी पेयजल को लेकर गंभीर संकट है। यहां न तो सरकारी पानी की योजना पहुंची है और न ही पानी पहुंचाने के लिए कोई सार्थक प्रयास हुए है। ऐसे में यह गांव आजादी के बाद पानी के लिए संघर्षरत है।

दरअसल, भलगाव ग्राम पंचायत का तारीसरा गांव में एक हजार की आबादी है। गांव से महज 15 किमी दूरी पर नर्मदा नहर का मीठा पानी पहुंच गया है, लेकिन आजादी के बाद से तारीसरा गांव में पेयजल को लेकर कोई सरकारी योजना नहीं पहुंची है। ऐसे में गांव में पेयजल को लेकर त्राही-त्राही मची हुई है। हर साल गांव में 50 फीसदी लोग गर्मी के मौसम में पलायन कर गुजरात जाते है।

फिर छह-सात माह मजदूरी करते है। बारिश के मौसम में पुन:गांव लौट आते है। यह संकट लंबे समय से है। लेकिन गांव के लिए न तो कोई सरकार स्तर पर प्रयास हुए है और न ही कोई पानी का सरकारी स्त्रोत बना है। ऐसे में ग्रामीणों के सामने पानी का भीषण संकट बना है। जिम्मेदार महकमा हर बार की तरह पानी पहुंचाने के दावे कर रहा है, लेकिन धरातल पर काम नहीं हुआ है।

पानी के लिए स्त्रोत नाकाफी, इसलिए पलायन
गांव में एक खेत में व्यक्तिगत बेरी का निर्माण हो रखा है, जिसमें सुबह 4 से 5 बजे तक अच्छा पानी मिलता है, क्योंकि रातभर पानी पाताल में सहेज जाता है। ऐसे में आसपास बसी ढाणियों का पानी के लिए नंबर लगता है। उन्हें भी महज एक-दो घड़े ही पानी नसीब होता है। यहां भी पानी के लिए ग्रामीण बारी तय करते है। फिर महीना भर परिवारों को बारी-बारी से पानी मिलता है। यहां एक जीएलआर का निर्माण तो हुआ, लेकिन आज तक पानी नहीं पहुंचा।

ग्रामीण बोले
देश का पहला गांव है, जहां पानी के लिए सुबह से शाम तक संघर्ष रहता है। यहां पानी का गंभीर संकट है। गर्मी के मौसम में स्थितियां खराब हो जाती है। दूर-दूर तक कोई मददगार नहीं है। -तारों बाई, ग्रामीण।

एक बेरी है, जहां पानी के लिए बारी लगती है। बैरी से दिन में दो बार पानी मिलता है। एक-दो घड़े पानी के लिए घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। वोट के समय तो खूब वादे करते है, लेकिन बाद में सब भूल जाते है। -दरिया, ग्रामीण।

गांव में पानी का भयंकर संकट है। नर्मदा नहर पहुंच गई, यहां पानी बॉर्डर तक पहुंच रहा है, लेकिन हम बूंद-बूंद के लिए तरस रहे है। मीठा पानी डलवाने को एक टैंकर के 1500 रुपए देने पड़ रहे हैं। आधे से ज्यादा पलायन कर चुके हैं। -प्रभूदान, ग्रामीण।

50 फीसदी लोगों का पलायन हुआ
गांव में पानी का गंभीर संकट है। पानी की कमी के चलते 50 फीसदी लोग परिवार व पशुधन के साथ पलायन कर चुके है। यह समस्या आज की नहीं है, आजादी के बाद से चल रही है। नर्मदा नहर 15 किमी दूर है, फिर भी समाधान नहीं। -वीरमाराम, पूर्व सरपंच।

नहरी पानी के लिए योजना बनाई, स्वीकृति नहीं मिली
तारीसरा गांव में पेयजल संकट है। इसके लिए जलदाय विभाग प्रयासरत है। नर्मदा नहर का पानी पहुंचाने के लिए योजना बनी है। इसके अलावा एक और स्कीम बनाई है, लेकिन स्वीकृति नहीं मिली है। मई तक पानी पहुंचा दिया जाएगा। स्कीम स्वीकृत करवाने के लिए प्रयासरत है। -अनिल कुमार, सहायक अभियंता, जलदाय विभाग।

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