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अब जिला अस्पताल में इलाज संभव:जिला अस्पताल में 1200 ग्राम के 34 तथा 1000 ग्राम से कम के 11 नवजात एक साल में हुए स्वस्थ

बाड़मेरएक महीने पहले
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जिला अस्पताल में एक साल के दाैरान 1200 ग्राम के 34 तथा 1000 ग्राम के 11 नवजात शिशुओं काे अस्पताल के शिशु राेग विशेषज्ञ डाॅक्टराें की टीम ने स्वस्थ कर घर भेजा है। सभी 45 शिशु स्वस्थ है। ये सभी शिशु प्री मेच्योर डिलेवरी के दौरान हुए थे।

पहले अस्पताल में इतनी सुविधाएं तथा डाॅक्टर की अनुपलब्धता के कारण इन्हें बाहर के लिए रेफर किया जाता था, लेकिन अब अस्पताल के विशेषज्ञ डाॅक्टर इनके इलाज में जुटे हुए है। जिला अस्पताल की शिशु मृत्यु दर तथा रेफर दर कम हुई है। प्रदेश की शिशु मृत्यु दर के मुकाबले अस्पताल की मृत्युदर में गिरावट आई है। जिला अस्पताल में कई ऐसी प्रसूताएं भी आ रही है जिन्हें प्रसव समय से पहले ही प्रसव दर्द शुरू हाे जाता है।

ऐसे में इन प्रसूताओं के प्रसव के बाद हुए नवजात शिशु का वजन 1200 ग्राम से कम हाे जाता है। मां के गर्भ में पूरा समय 37 से 42 सप्ताह नहीं हाेने पर इनका विकास कम हाेता है। जिला अस्पताल में भर्ती हुए ऐसे 45 शिशुओं में अधिकतर का जन्म 28 से 30 सप्ताह के बीच का है। इससे इनका शारीरिक विकास में कम हुआ। ऐसे अधिकतर शिशुओं में कॉम्पलीकेशन हाेने के कारण इन्हें हाई सेंटर रेफर किया जाता था, लेकिन अब शिशु राेग विशेषज्ञ इनका इलाज अस्पताल में ही कर रहे हैं।

ऐसे नवजात जिनके शरीर में रहे विकार व डॉक्टरों ने किया इलाज

प्री मैच्योर्ड प्रसव के दाैरान नवजात का वजन कम हाेता है। इन्हें नेक्रोटाइजिंग इंटेराेपाेलाइटिश (एनईसी) अांताें का रुकना या गलन हाेना, पेटेंड ड्सट्स आरटीरियाेरस (पीडीए) हृदय में छेद का बना रहना पूरा बंद नहीं हाेना, फेफड़ाें की बनावट पूर्ण रूप से नहीं हाेती या फेफड़ाें कम फूलना (सरफेक्टेंट), इनका पेट फूल हाेता है, मां का दूध नहीं पी पाते या उगल नहीं पाते।

ऐसे शिशुओं काे नेजाेगेस्ट्रीक फीडिंग (एनजी) ट्यूब से दूध दिया जाता है। सामान्य प्रसव 37 से 42 सप्ताह का हाेता है तथा शिशु का वजन भी ढाई किलाे या इससे अधिक का हाेता है। प्री मैच्योर्ड प्रसूताओं में खून की कमी का हाेना, ब्लड प्रेशर का कम या ज्यादा हाेना, बुखार आना, कमजाेर या कम उम्र में मां बनना तथा प्रसव के दाैरान दाे से तीन साल से कम का अंतराल हाेने पर प्री मैच्योर्ड डिलेवरी हाेती है।

राउंड दी क्लाक रहते हैं डॉक्टर एसएनसीयू वार्ड में
एसएनसीयू वार्ड में शिशु राेग विशेषज्ञ डाॅ. हरीश चाैहान, डाॅ. अमित शांडिल्य, डाॅ. जसराज बाेहरा, डाॅ. रतनाराम चाैधरी, डाॅ. महेंद्र चाैधरी, जूनियर रेजिडेंट डाॅ. देवेंद्र विश्नोई नवजात की देखरेख में राउंड दी क्लॉक ड्यूटी पर कार्यरत हैं। वहीं नर्सिंग स्टाफ वार्ड इंचार्ज ग्रेड प्रथम गणेश खत्री,अनिल पंवार, दीपा नायर, सवाईराम, किशनाराम,किरण विश्नाेई, मिथलेश सहित स्टाफ ड्यूटी पर तैनात रहता है।

प्रसूता काे एक अप्रैल काे प्रसव पीड़ा हाेने पर अस्पताल लाया गया था। इमरजेंसी में सिजेरियन कर प्रसव करवाया गया। सात से अाठ महीने का प्रसव था। लड़के काे जन्म दिया, लेकिन वजन 1100 ग्राम का था। कमजाेर था दूध नहीं पी पा रहा था। फिलहाल बच्चा ठीक है दूध भी पी रहा है।- प्रहलाद, परिजन, चाैहटन।

सात माह के प्रसव के दाैरान अचानक दर्द हाेने पर सामान्य प्रसव हुआ। समय पूर्व प्रसव से शिशु कमजाेर था। आंताें में रुकावट तथा पेट फूल गया था और इंफेक्शन हाे रखा था। 1200 ग्राम के शिशु तथा मुझे 24 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया। बच्चे काे पहले ट्यूब से दूध दिया गया लेकिन अब बच्चा स्वस्थ है और दूध पी रहा है।-गुड्डी, प्रसूता, नेहरू नगर।

एसएनसीयू में कम उम्र के शिशुओं का इलाज जारी है। जिला अस्पताल के मेडिकल काॅलेज में क्रमोन्नत हाेने के कारण उपकरण बढ़े हैं और डाॅक्टराें की संख्या भी बढ़ी है। ऐसे में रेफर रेट कम हाे गई है। शिशुओं की रेफर तथा मृत्यु दर कम करने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। अधिकतर शिशुओं का जन्म 28 से 30 सप्ताह के बीच का है। - डाॅ. अमित शांडिल्य, असिस्टेंट प्राेफेसर, शिशु राेग विभाग।

अस्पताल में डाॅक्टराें की संख्या के बढ़ने से शिशुओं काे रेफर नहीं कर यहीं इलाज किया जा रहा है। कम वजन के शिशुओं काे अधिक बचाया जा रहा है। डाॅक्टराें की टीम 24 घंटे काम कर रही है। अस्पताल में प्री मैच्योर्ड प्रसूताओं की डिलवरी की संख्या भी बढ़ी है। प्रदेश के मुकाबले शिशु मृत्यु दर और रेफर रेट में काफी गिरावट आई है।- डाॅ. बीएल मसूरिया

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