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जज्बे को सलाम:कोविड वार्डों में निराशा के माहौल में 24 घंटे ड्यूटी कर रहे 57 डॉक्टर जगा रहे आशा, जिंदगी बचाने सिलेंडर व स्ट्रेचर खुद ला रहे हैं

बाड़मेरएक महीने पहले
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डॉ. विष्णु कुमार विश्नोई, डॉक्टर। - Dainik Bhaskar
डॉ. विष्णु कुमार विश्नोई, डॉक्टर।
  • जिला अस्पताल के सात वार्डों में एक पारी में 19 डॉक्टर 8 घंटे करते हैं ड्यूटी, बिना थके कर रहे मरीजों का इलाज

जिला अस्पताल बाड़मेर में इमरजेंसी समेत सभी वार्ड फुल हो चुके हैं। रोजाना पांच से सात कोरोना रोगियों की मौतों से निराशा का माहौल है। कोविड वार्डों में ऑक्सीजन पर जिंदगी की सांसें गिन रहे गंभीर मरीजों का सब्र भी टूट रहा है। इस नकारात्मक माहौल के बीच डॉक्टर अपना फर्ज बखूबी निभा रहे हैं।

सात वार्डों में 57 डॉक्टर 24 घंटे मरीजों की सेवा में जुटे हैं। आठ घंटे पीपी किट पहने डॉक्टरों का शरीर पसीने से लथपथ रहता है। इस बीच गंभीर मरीज की तबीयत बिगड़ने पर डॉक्टर ही ऑक्सीजन के सिलेंडर उठाने से लेकर स्ट्रेचर भी खुद ही ला रहे हैं। मरीजों की हर हाल में जान बचाने में डॉक्टरों की टीम कोई कसर नहीं छोड़ रही है।

कोरोना मरीजों के बीच आठ घंटे रहने के बावजूद खुद के पॉजिटिव होने की परवाह किए बिना ही हर परिस्थिति में कोरोना रोगी की जान बचाने में जुटे हैं। आज पढि़ए जिला अस्पताल के चार युवा डॉक्टरों के कोविड वार्डों में ड्यूटी के जज्बे से जुड़ी खबर....

कोरोना रोगियों का इलाज कर रहे चार युवा डॉक्टरों की जुबानी-

विलाप से मन कमजोर होता है, नहीं हारे हिम्मत

जिला अस्पताल में डॉक्टर व संसाधन पर्याप्त है। बावजूद इसके मरीज क्षमता से अधिक आने से व्यवस्थाएं भी जवाब दे रही है। कोविड वार्ड में रोजाना आठ घंटे ड्यूटी कर रहे हैं। वार्ड के सभी मरीज ऑक्सीजन पर है। चंद मिनट भी ऑक्सीजन सिलेंडर लाने में देरी हो जाए तो मरीज की जान जा सकती है। इस स्थिति में टीम के साथ मरीजों की सेवा में जुट जाते हैं। कई बार उनकी आंखों के सामने ही मरीज दम तोड़ देता है। परिजनों को विलाप करते देखकर एक बार मन कमजोर जरूर होता है, लेकिन हिम्मत नहीं हारते हैं। मरीज की जान बचाना ही प्राथमिकता रहती है। -डॉ. विष्णु कुमार विश्नोई, डॉक्टर।

सिलेंडर उठाते-उठाते हेल्पर भी हांफ जाते हैं

कोविड वार्ड में ड्यूटी पर पहुंचने से पहले मन में एक ही संकल्प लेकर जाता हूं कि मरीजों की जिंदगी हर परिस्थिति में बचानी ही है। फिर मरीजों की सेवा में टीम के साथ जुट जाते हैं। आठ घंटे कब पूरे हो जाते है इसका पता ही नहीं चलता है। हर बेड पर ऑक्सीजन की मॉनिटरिंग जरूरी होती है। हेल्परों से सिलेंडर खत्म होने से पहले ही दूसरा सिलेंडर मंगवा लेते हैं। कई बार तो हालत यह हो जाती है कि हेल्पर सिलेंडर उठाते थक जाते हैं। एक दिन दो हेल्पर आए और बोले की डॉक्टर साहब हमारी बीपी चेक करो। नर्सिंग स्टाफ भी आठ घंटे एक बेड से दूसरे बेड के बीच दौड़ते ही रहते हैं। -डॉ. दिनेश सोलंकी, जूनियर डॉक्टर।

संकट में ड्यूटी का फर्ज निभाना ही सौभाग्य

कोरोनाकाल में ड्यूटी का फर्ज निभाना ही हमारा सौभाग्य है। संकट की घड़ी में डॉक्टर के भगवान होने का अहसास करवाता है। कोविड वार्डों में दर्द से तड़प रहे मरीजों का हाल देखा नहीं जा सकता है। मरीजों के परिजनों में निराशा रहती है कि अगले पल क्या होगा। इस सोच में उनके चेहरों पर उदासी लाजमी है। चारों तरफ निराशा के माहौल में रोगियों का इलाज कर रहे हैं। इस बीच किसी की तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है तो उसे पहले देखते हैं। कई बार उनकी आंखों के सामने मरीज दम तोड़ देते हैं। इसका उन्हें मलाल रहता है, लेकिन कुछ कर नहीं पाते हैं।-डॉ. कमला विर्ट, जूनियर रेजिडेंट।

दिल पर पत्थर रखकर करते हैं रोगियों का इलाज

कोविड वार्ड में ड्यूटी करना चुनौती से कम नहीं है। यहां पर गंभीर स्थिति में ही मरीज पहुंचता है। उसके इलाज में मामूली भी देर हो जाए तो सांसें उखड़ सकती है। इन हालातों में दिल पर पत्थर रखकर इलाज करना पड़ता है। कोरोना रोगियों का इलाज करते हुए कई बार खुद के पॉजिटिव होने का भी डर रहता है। फिर भी बिना रूके रोगियों के बीच काम करते रहते हैं। कोरोना की दूसरी लहर बेहद घातक है। इस स्थिति में लोगों को मास्क के साथ दो गज की दूरी की पालना करनी ही चाहिए। मास्क भी कपड़े का सामान्य पहनना सही नहीं है। -डॉ. दीप्ति सिंह, मेडिकल ऑफिसर।

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