पुरखों की विरासत को नहीं भूले लोग:भारत-पाक बॉर्डर के बंधड़ा गांव में पक्के घरों के साथ एक झोंपा जरूर

बाड़मेर20 दिन पहले
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कंटेंट: पूनमसिंह राठौड़, फोटो: नरपत रामावत, ड्रोन एफर्ट: जी. के. बामणिया - Dainik Bhaskar
कंटेंट: पूनमसिंह राठौड़, फोटो: नरपत रामावत, ड्रोन एफर्ट: जी. के. बामणिया

राजस्थान में भारत-पाक बॉर्डर पर आबाद बंधड़ा गांव में करीब 800 घरों की आबादी है। 70 साल पहले खुहड़ी से पलायन कर आए ग्रामीणों ने बंधड़ा गांव को बसाया था। पिछले सात दशक में आर्थिक-सामाजिक बदलाव की बयार से सब कुछ बदल चुका है। बीस साल पहले जहां पूरे गांव में कच्चे झोंपे ही थे, आज हर घर में पक्का मकान है। हर दूसरे घर में एक वाहन या बाइक है। बावजूद इसके इस गांव के लोग पुरखों की विरासत को नहीं भूले हैं। बंधड़ा गांव में लगभग हर घर में पक्के मकान के बावजूद एक झोंपा जरूर है। इसका उपयोग अधिकतर रसोई के रूप में कर रहे हैं तो किसी ने बैठक कक्ष बना रखा है।

गांवों में इसलिए रास आ रहे हैं झोंपे
घास-फूस से बने झोंपे हर मौसम में अनुकूल रहते हैं। 50 डिग्री पारे में भी झोंपे में ठंडक महसूस होती है। सर्दी में भी अनुकूल रहता है। यानी हर मौसम में झोंपे सुकून देते हैं। इसलिए आज भी हर घर में एक झोंपा बना रहे हैं।

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