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धर्म समाज:बाबा रामदेव हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक, पीरों ने भी उन्हें पीरों के पीर माना: अभयदास

बाड़मेर9 दिन पहले
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अवतारधाम रामदेरिया में चल रही बाबा रामदेव की लीलामृत कथा के छठे दिन युवाचार्य अभयदास महाराज ने बाबा की महिमा के बारे में भक्तों को बताया। इस दौरान उन्होंने कहा कि जब रामदेवजी के चमत्कारों की चर्चा चारों ओर होने लगी तो मक्का से पांच पीर उनकी परीक्षा लेने आए। वे उनकी परख करना चाहते थे कि रामदेव के बारे में जो कहा जा रहा है, वह सच है या झूठ। बाबा ने उनका आदर-सत्कार किया।

जब भोजन के समय उनके लिए जाजम बिछाई गई तो एक पीर ने कहा, हम अपना कटोरा मक्का में ही भूल आए हैं। उसके बिना हम आपका भोजन ग्रहण नहीं कर सकते। इसके बाद सभी पीरों ने कहा कि वे भी अपने ही कटोरों में भोजन करना पसंद करेंगे।

इस पर बाबा रामदेव ने कहा कि आतिथ्य हमारी परंपरा है। हम आपको निराश नहीं करेंगे। अपने कटोरों में भोजन ग्रहण करने की आपकी इच्छा पूरी होगी। यह कहकर बाबा ने वे सभी कटोरे रूणिचा में ही प्रकट कर दिए, जो पांचों पीर मक्का में इस्तेमाल करते थे। यह देखकर पीरों ने भी बाबा की शक्ति को प्रणाम किया और उन्होंने बाबा को पीरों के पीर की उपाधि दी। इस वजह से बाबा रामदेव हिंदू-मुस्लिम एकता के अग्रगामी है।

इसके बाद अभयदास महाराज ने बाबा रामदेव के विवाह प्रसंग के बारे में बताया कि बाबा रामदेव का विवाह उमरकोट जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित हैं। वहां के दलपत सोढा की पुत्री नेतलदे के साथ हुआ था। नेतलदे जन्म से दिव्यांग थी, जो चल फिर नहीं सकती थी।

लेकिन बाबा रामदेव ने उन्हें पूर्व जन्म में वचन दिया था कि उनके साथ ही विवाह होगा। विवाह प्रसंग में नेतलदे को फेरे दिलवाने के लिए बैशाखियां लाई गई लेकिन बाबा ने जब नेतलदे का हाथ पकड़कर खड़ा किया और वे अपने पैरो पर चलने लगी। इस तरह बाबा रामदेवजी का विवाह बड़े हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ।

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