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बाड़मेर में लगा जूती फेस्टिवल:सैकड़ों परिवार 8-9 पीढ़ियों से जुड़े उद्योग से, अब छोड़, लगे दूसरे काम

बाड़मेर2 महीने पहले
हाथों से बनी अलग-अलग डिजाइन की सजी जूतियां

एक जमाने में लोग जूती को बड़े ही शान से पहनते थे। जिसको बनाने के लिए पहले ऑर्डर दिया जाता था, लेकिन समय के साथ नई-नई डिजाइन और ऑनलाइन खरीददारी की वजह से यह कला लूप्त हो रही थी। कला को बचाने के लिए कुछ संस्थाएं आगे आ रही है राजस्थानी नहीं पूरे देश में बाड़मेर जिले की पाटोदी कस्बे हाथों से बनी जूती की कशीदाकारी बड़ी मशहूर मानी जाती है। लेकिन शायद आपको सुनने में अटपटा लग रहा होगा कि जूती का मेला पाटोदी में शुरू हुआ है इस मेले में आपको तरह-तरह की हाथों से बनी कशीदाकारी जूतियां मिल रही है।

जूती पर हाथों से कशीदाकारी करती महिला। पूरी जूती हाथों से तैयार की जाती है।
जूती पर हाथों से कशीदाकारी करती महिला। पूरी जूती हाथों से तैयार की जाती है।

बाड़मेर के पाटोदी गांव ऐसे परिवार है जो 8-9 पीढ़ियों से जूती उद्योग से अपना गुजारा चला रहे है। आज भी इस गांव में पूरा परिवार इस जूती बनाने में लगते है। महिलाएं आज भी जूती की कशीदाकारी हाथ से करती है। वहीं परिवार के लोग चमड़े को जूती का आकार तैयार करते है। जूती उद्योग के संरक्षण के चलते लुप्त होता जा रहा था। लेकिन अब यूनिस्को व राजस्थान टूरिज्म की ओर से शनिवार से शुरू हुए फेस्टिवल से मानों अब इसको पंख लग जाएंगे।

कारीगर हरीश का कहना है कि जूती बनाने में एक दिन लग जाता है। कशीदाकारी से लेकर जूती बनाने तक सब हाथों से तैयार करते है।
कारीगर हरीश का कहना है कि जूती बनाने में एक दिन लग जाता है। कशीदाकारी से लेकर जूती बनाने तक सब हाथों से तैयार करते है।

पाटोदी के हरीश का कहना है कि हमारे परिवार में चार लोग है जो सभी इसमें लगे हुए है। सालाना करीब 150-200 जूती तैयार कर पाते है। अलग-अलग क्वालिटी की जूती 1100 रुपए से लेकर 5000 रुपए तक बिकती है। अब जूती के साथ हाथ से बने बैग, सहित अन्य सामान बनाते है। वह भी बिक जाते है। पहले के समय में और अब में डिजाइन में भी बहुत फर्क आ गया है। युवा डिजाइन देखकर अपने हाथों से नई डिजाइन बना देते है।

चमड़ा अलग-अलग राज्यों से आता है

कारीगर हरीश जीनगर का कहना है कि यह बड़े-बड़े व्यापारी मद्रास, कानपुर, चेन्नई अन्य राज्यों से जोधपुर लेकर आते है। हम लोग जोधपुर से खरीदकर लाते है। एक जूती में करीब तीन तरीके का चमड़ा उपयोग में होता है। तीनों अलग-अलग क्वालिटी व रेट का होता है। 50 रुपए किलो से लेकर 500 रुपए किलो तक चमड़ा आता है। जिसकों हम लोग खरीदते है। 1 हजार रुपए तक का भी चमड़ा आता है।

हाथों से तैयार करती है महिलाएं डिजाइन

हरीश का कहना है कि जूती-बड़ी जूती जैसी बनानी होती है उस हिसाब से उसको काटा जाता है। जूती पर कशीदाकारी करते करीब तीन से चार घंटे लगते है। जैसी कशीदाकारी होगी उतना ज्यादा टाइम लगेगा। कशीदाकारी केवल महिलाएं ही करती है।

एक जूती जोड़ी बनाने में लगता एक दिन

कारीगर हरीश का कहना है कि एक जूती बनाने में एक दिन पूरा लग जाता है। जब पति-पत्नी दोनों लगते है तब एक दिन में पूरी जूती होती है। जूती पर कशीदाकारी महिलाएं ही कर सकती है। चमड़े से बनी जूती पहनने से आंखे ठंडी रहती है। जितनी मेहनत करके हम लोग हाथ से जूती बनाते है उतना मेहताना हमें नहीं मिल पाता है। इसलिए राजस्थान टूरिज्म व यूनिस्कों यहां पर फेस्टिवल लगाया है। इसमें जूती के अलावा हाथ से जितने भी बैग सहित अन्य चीजों को रखेंगे।

पाटोदी में 200 परिवार बनता है जूती

पाटोदी कस्बे में 200 परिवार ऐसे हैं जो कि पिछली कई पीढ़ियों से लगातार परंपरागत कशीदाकारी करके जूतियां बनाया करते हैं। अब कशीदाकारी जूती बनाने में मेहनत बहुत लगती है उतना पैसा नहीं मिल पाता है। इसके चलते दिन-ब-दिन जूती उद्योग लुप्त होता जा रहा है। पूरा मेहनताना न मिलने के चलते अब यह लोग धीरे-धीरे गांव से बाहर जाकर दूसरी मजदूरी कर रहे हैं। इन लोगों का कहना है कि अगर सरकार और कुछ संस्थाएं हमारी मदद करें और हमारी इस कारीगरी को देश-विदेश में प्रदर्शनी करने का मौका मिले तो हमारे लिए किसी जीवनदान से कम नहीं होगा अन्यथा आने वाले कुछ समय में यह कारीगरी पूरी तरीके से लुप्त हो जाएगी

कपड़े पर कशीदाकारी ने रूमादेवी को दिलाई पहचान

बाड़मेर के ग्रामीण इलाकों में कपड़े पर कशीदाकारी करने वाली महिलाओं को उनका पूरा मेहनताना नहीं मिलता था। लेकिन जब यही कशीदाकारी देश-विदेश के अंदर प्रदर्शनी लगाकर लोगों को नए लुक के साथ आकर्षित किया तो बाड़मेर जिले की हजारों महिलाओं को रोजगार मिल गया। साथ ही सैकड़ों परिवारों के लिए रोजी-रोटी का संकट दूर हो गया यह संभव हो पाया है देश की विख्यात महिला रूमा देवी की वजह से। ऐसे में अब यहां के लोगों को भी इसी तरीके की उम्मीद है कि कोई हमारे लिए इस तरीके की पहल करें ताकि हमारे इस हुनर को नए जमाने के साथ नहीं पहचान मिले ताकि यह परंपरा लुप्त होने से बच जाए।