गोवंश में बीमारी बढ़ने के बाद जागा पशुपालन विभाग:लंपी स्कीन बीमारी से पशुपालक चितिंत, बनाया कंट्रोल रूम, जारी की एडवाइजरी

बाड़मेर2 महीने पहले
गोवंश में तेजी से फल रहा है संक्रमण, विभाग में जागा। - Dainik Bhaskar
गोवंश में तेजी से फल रहा है संक्रमण, विभाग में जागा।

बाड़मेर में गोवंश में लंपी स्कीन डिजीज (ढेलेदार त्वचा रोग) बढ़ने के बाद पशुपालन विभाग अलर्ट मोड पर नजर आ रहा है। विभाग ने एडवाइजरी जारी करते हुए जिला मुख्यालय पर कंट्रोल रूम भी बनाया है। यह बीमारी संक्रमित पशु के संपर्क में आने या किलनी, मच्छर एवं मक्खी द्वारा दूसरे पशुओं में फैलता है। लंपी स्कीन डिजीज कोरोना वायरस की तरह पशुओं में फैल रहा है। बीमारी की अभी तक वैक्सीन नहीं आई है। पशुओं को संक्रमित पशुओं से दूर रखकर ही या समय पर उपचार से ही बचाया जा सकता है। विभाग ने बीमारी को फैलने से रोकने के लिए पशुपालकों से अपील की है कि स्वस्थ व बीमारी पशुओं को अलग-अलग कर दें।

दरअसल, गोवंश में फैल रही लंपी स्कीन डिजीज का खतरा जिले में बढ़ता जा रहा है। पशुपालकों ने बचाव को लेकर ध्यान नहीं दिया तो एक-दूसरे मवेशी के संपर्क में आने से फैलने वाली वायरस यह बीमारी पूरे जिले में फैल सकती है। इससे मवेशियों की दिक्कत तो बढ़ेगी ही, रोग की जद में आने वाले दुधारू मवेशियों के चलते दुध उत्पादन पर असर पड़ेगा। इससे पशुपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। यह वायरस बाड़मेर शहर, सिणधरी, सेड़वा, धोरीमन्ना, चौहटन, गडरारोड इलाकों में फैल चुका है।

पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. रतनलाल जीनगर ने बताया कि पशुपालन विभाग ने रोग से बचाव के लिए एडवाइजरी जारी की है। हालांकि विभाग दावा कर रहा है कि पशुओं में मौत की संख्या कम है। पशुपालकों से आग्रह है कि एलएसडी (लंपी स्कीन डिजीज) से भयभीत न होकर बताये जा रहे तरीकों से पशुओं का बचाव व उपचार करावें। ढेलेदार त्वचा रोग (लम्पी स्कीन डिजीज-एलएसडी) गोवंश में होने वाला विषाणु जनित संक्रामक रोग है जोकि पॉक्स फेमिली के वायरस जिससे अन्य पशुओं में पॉक्स (माता) रोग होता है।

मुख्यालय पर बनाया कंट्रोल रूम

जिला कलेक्टर के निर्देशानुसार रोग नियंत्रण के लिए जिला मुख्यालय पर कंट्रोल रूम स्थापित कर जिले के सभी ब्लॉक स्तरीय नोडल अधिकारियों को भी रोग नियंत्रण के लिए क्षेत्र में सर्वे व प्रभावित गांवों में शिविर लगाकर समुचित उपचार व्यवस्था करने के दिशा-निर्देश दिए हैं। पशुपालको से अपील हैं कि रोग नियंत्रण के लिए जारी एडवाईजरी की पालना करें, ताकि अधिकाधिक मवेशियों को रोग ग्रस्त होने से बचाया जा सके।

ऐसे फैल रहा है संक्रमण

ढेलेदार त्वचा रोग गाय एवं भैंस में पॉक्स विषाणु (कैप्रीपॉक्स वायरस) के संक्रमण से होता है। संक्रमण हस्तांतरण (transfer) विषाणु के वाहक जैसे किलनी, मच्छर एवं मक्खी से फैलता है। संक्रमित पशु के शरीर पर बैठने वाली किलनी, मच्छर व मवेशी जब स्वस्थ पशु के शरीर पर पहुंचते हैं तो संक्रमण उनके अंदर भी पहुंच जाता है। बीमार पशुओं को एक से दूसरे जगह ले जाने या उसके संपर्क में आने वाले पशु भी संक्रमित हो जाते हैं।

संक्रमण गर्मी व नमी में बढ़ता है

इस बीमारी का प्रकोप गर्म एवं आर्द्र नमी वाले मौसम में अधिक होता है। मौजूदा समय में जिस तरह से गर्मी व उमस बढी है। उससे रोग के फैलने का खतरा भी बढ चुका है। हालांकि ठंडी के मौसम में स्वतः इसका प्रभाव कम हो जाता है।

गोवंश में यह होते है लक्षण

त्वचा पर ढेलेदार गांठ की तरह बन जाता है। इसके साथ ही मवेशियों के नाक एवं आंख से पानी निकलने लगता है। शरीर का तापमान बढ जाता है। मवेशी बुखार की जद में आ जाते हैं।

पशुओं में गांठ, बुखार

बीमारी से ग्रसित मवेशी के शरीर पर पड़ने वाले गांठ जब तक कड़े रहते हैं तो जकडन व दर्द बना रहता है। पककर फूटने के बाद शरीर में घाव बन जाता है। जिसमें मक्खियां आदि बैठती हो तो कीड़े तक पड़ जाते हैं। घाव व बुखार से पशु कमजोर हो जाते हैं। इससे दुग्ध उत्पादन भी प्रभावित होता है।

समय पर कराए उपचार

संक्रमित पशु को एक जगह बांधकर रखें। उन्हें स्वस्थ पशुओं के संपर्क में न आने दें। स्वस्थ पशुओं का गोटपोक्स टीकाकरण करवाएं तथा बीमार पशुओं को बुखार एवं दर्द की दवा तथा लक्षण अनुसार उपचार करें।

जूनोटिक रोग (पशु से मानव में संक्रमण) नहीं हैं एलएसडी

वायरसजनित यह रोग जूनोटिक डिजीज की श्रेणी में नहीं आता हैं, लिहाजा पशुपालक इससे अकारण भयभीत नहीं हो। बीमार गाय के गर्म दूध के सेवन से इंसानों में इसका कोई विपरीत असर अब तक सामने नहीं आया हैं। सोशल मीडिया पर चल रही इस रोग की अफवाहों से पशुपालक सतर्क रहें।