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राजस्थान में पाबंदियों से जीवंत हुई परंपरा:सजे-धजे ऊंटों पर सवार होकर निकले दूल्हे और बाराती, दुल्हन भी इसी पर लाए; 80 के दशक के बाद पहली बार दिखा ऐसा नजारा

बाड़मेर10 दिन पहलेलेखक: विजय कुमार
जैसलमेर बांधेवा गांव से बाड़मेर जाती बारात।

कोरोना संक्रमण के कारण लोगों पर पाबंदियां लगीं तो परंपराएं एक बार फिर से जीवंत हो उठी हैं। 80 के दशक तक राजस्थान के कई सुदूर इलाकों की सवारी ऊंट हुआ करता था। समय बदला तो लोग गाड़ियों से चलने लगे, लेकिन लॉकडाउन ने फिर से ऊंट की सवारी शुरू करवा दी है। मजबूरी ही सही, लेकिन इन पाबंदियों ने कुछ अच्छा भी किया है।

जैसलमेर जिले के बांधेवा निवासी महिपाल सिंह की शादी 30 अप्रैल को थी। इस बीच सरकार ने बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच पाबंदियां बढ़ा दीं। तब महिपाल और उनके परिवार के लोगों ने तय किया कि नियमों का पालन करने के साथ ही शादी करनी है।

महिपाल ने 15-20 लोगों की बारात ऊंटों पर ले जाना तय किया। उनके घर में कुछ ऊंट थे। चार-पांच ऊंट गांव से मंगवाए। बारात के दिन ऊंटों को सजाया गया। दूल्हे के ऊंट को बोरला, नथ, घुंघरू, लूम्बी बांधने के बाद शीशे की कारीगरी के कपड़े पहनाए गए।

ऊंटों पर जाते बाराती और दूल्हा महिपाल सिंह।
ऊंटों पर जाते बाराती और दूल्हा महिपाल सिंह।

रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बारातियों के साथ ऊंटों का काफिला
30 अप्रैल शाम को रेतीले धोरों से निकलते ऊंटों पर सवार बारात का नजारा हर किसी को मोहने वाला था। रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे बारातियों के साथ ऊंटों का काफिला सबको अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। जैसलमेर जिले के बांधेवा केसुलापना महेचो की ढाणी से ऊंट पर महिपाल सिंह बारात लेकर बाड़मेर गिड़ा तहसील के केसुबला कालजीरो भाटियों की ढाणी पहुंचे।

7 किलोमीटर दूर स्थित गांव केसुबला में शादी कार्यक्रम संपन्न कर रात को ही दुल्हन को लेकर बारात वापस अपने घर पहुंची।

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