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खेती:जीरे की फसल में नियमित छिड़काव व सिंचाई से होगा रोगों से बचाव: डॉ. पगारिया

गुड़ामालानी9 दिन पहले
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  • गुजरात व राजस्थान में देश के 80 फीसदी जीरे का उत्पादन, बाड़मेर व जालोर प्रदेश में जीरा उत्पादन करने में सबसे बड़ा हब

जीरा मसाले वाली मुख्य बीजीय फसल है। देश का 80 प्रतिशत से अधिक जीरा गुजरात व राजस्थान राज्यों में उगाया जाता है। राजस्थान में देश के कुल उत्पादन का लगभग 28 प्रतिशत जीरे का उत्पादन किया जाता है तथा राज्य के पश्चिमी क्षेत्र में कुल राज्य का 80 प्रतिशत जीरा पैदा होता है लेकिन इसकी औसत उपज पड़ोसी राज्य गुजरात की अपेक्षा काफी कम है।

उन्नत तकनीकों के प्रयोग द्वारा जीरे की वर्तमान उपज को 25-30 प्रतिशत बढ़ाया जा सकता है। इस वर्ष जीरा जिले में लगभग 2.0 लाख हेक्टेयर बोया गया है। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डाॅ. प्रदीप पगारिया ने बताया कि वर्तमान में मौसम में हो रहे परिवर्तन को देखते हुए जीरे में विभिन्न प्रकार के रोग आने की संभावना है।

जीरे की फसल में होने वाले एफिड, उखटा, झुलसा व छाछया रोग में लक्षण दिखते ही किसान करें उपचार

चैंपा या एफिड

इस कीट का सबसे अधिक प्रकोप फूल आने की अवस्था पर होता है। यह कीट पौधों के कोमल भागों का रस चूसकर फसल को नुकसान पहुंचाता है। इस कीट के नियंत्रण हेतु इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल. की मात्रा 200 मिलीलीटर या एसीफेट की 750 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिए।

उखटा रोग

इस रोग के कारण पौधे मुरझा जाते हैं तथा यह आरंभिक अवस्था में अधिक होता है लेकिन किसी भी अवस्था में यह रोग फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है। प्रबंधन इस रोग की रोकथाम के लिए बीज को ट्राईकोडर्मा की 4 ग्राम प्रति किलो या बाविस्टीन की 2 ग्राम प्रति किलो बीज दर से उपचारित करके बोना चाहिए।

प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। खेत में ग्रीष्म ऋतु में जुताई करनी चाहिए ताकि एक ही खेत में लगातार जीरे की फसल नहीं उगानी चाहिए। खेत में रोग के लक्षण दिखाई देने पर 2.5 किग्रा ट्राईकोडर्मा की 100 किलो कम्पोस्ट के साथ मिलाकर छिड़काव कर देना चाहिए तथा हल्की सिंचाई करनी चाहिए।

झुलसा व छाछया रोग

यह रोग फसल में फूल आने के पश्चात बादल होने पर लगता है। इस रोग के कारण पौधों का उपरी भाग झुक जाता है तथा पत्तियों व तनों पर भूरे धब्बे बन जाते हैं ये रोग इतनी तेजी से फैलता है कि रोग के लक्षण दिखाई देते ही यदि नियंत्रण कार्य न कराया जाए तो फसल को नुकसान से बचाना मुश्किल होता है। इस रोग के नियंत्रण के लिए मेन्कोजेब की 2 ग्राम मात्रा को प्रति लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। छाछया रोग के कारण पौधे पर सफेद रंग का पाउडर दिखाई देता है।

जीरे में लगे रोगों से इस तरह करें बचाव

बीमारी के नियंत्रण के लिए गंधक का चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकावें। प्रथम छिड़काव बुवाई के 30-35 दिन पश्चात मैन्कोजेब 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर करें। दूसरा छिड़काव बुवाई के 40-45 दिन पश्चात मैन्कोजेंब 2 ग्राम, इमीडाक्लोप्रिड 0.5 मिली, तथा घुलनशील गंधक 2 मिली प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिए। तीसरे छिड़काव में मैन्कोजेब 2 ग्राम, इमिडाक्लोरोप्रिड 0.5 मिली व 2 ग्राम घुलनशील गंधक प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर बुवाई के 60-70 दिन पश्चात कर देना चाहिए।

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