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अंतरराष्ट्रीय वेबिनार :जांभाणी साहित्य की वेब संगोष्ठी का हुआ समापन

सेड़वा15 दिन पहले
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जाम्भाणी साहित्य अकादमी एवं हिंदी विभाग मुंबई विश्वविद्यालय मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय वेबिनार के दूसरे दिवस के प्रथम सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. किशनाराम विश्नोई ने भक्तिकालीन साहित्य और जांभाणी साहित्य विषय पर अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए भारतीय आध्यात्मिक चिंतन परंपरा और जांभाणी साहित्य को विभिन्न संदर्भों से प्रस्तुत किया। 

सत्र के विशिष्ट वक्ता डॉ. विश्वजीत कुमार मिश्र ने मध्यकालीन साहित्य में युगबोध और जांभाणी साहित्य विषय पर व्याख्यान दिया। डॉ. मिश्र ने जंभवाणी और जांभाणी साहित्य में निहित युग बोध को विस्तारपूर्वक रेखांकित किया। पांडिचेरी विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जय शंकर बाबू ने  गुरु जांभोजी की वाणी को भारतीय भाषाओं के साहित्य की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद की आवश्यकता महसूस की।

डॉ. दर्शन पांडेय ने भक्ति साहित्य और समाज दर्शन तथा जाभाणी साहित्य में निहित आध्यात्मिक चेतना पर प्रकाश डाला। डॉ. प्रभाकर सिंह ने जंभवाणी के वैश्विक परिदृश्य और पर्यावरण चिंतन पर व्याख्यान दिया।इस सत्र का संयोजन डॉ मनमोहन लटियाल, सचिव जांभाणी साहित्य अकादमी ने किया और धन्यवाद ज्ञापन हिन्दी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय की डॉ. अंशु शुक्ला ने ज्ञापित किया।

जांभाणी साहित्य अकादमी के सदस्य मोहनलाल खिलेरी ने बताया कि समापन सत्र की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित ने जांभाणी साहित्य को हिंदी साहित्य इतिहास के भक्ति कालीन साहित्य की परिधि में रखकर बहुत ही सारगर्भित उद्बोधन दिया।  भक्ति साहित्य की लोक भाषा, साहित्य और समाज पर गंभीरता से प्रकाश डालने के साथ ही गुरु जांभोजी की वाणी को जीवन चरित में धारण करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।

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