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निरक्षर महिलाएं लेकिन हाथ के हुनर में साक्षर:तीन पीढ़ियां एक साथ करती हैं हैंडीक्राफ्ट का काम, इनकी कला देखकर सीखते हैं अंतरराष्ट्रीय डिजाइनर

बाड़मेरएक महीने पहले
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अभावों के बावजूद संघर्ष से परिवार का आधार बनी सफियत - Dainik Bhaskar
अभावों के बावजूद संघर्ष से परिवार का आधार बनी सफियत

बाड़मेर | बॉर्डर पर आबाद गांवों में जितनी दिक्कतें है उतने ही यहां हर घर में रंग बिखरे पड़े है। भारत-पाक सीमा पर स्थित अंतिम गांव आरबी की गफन। यहां बारी नाम की महिला जिनकी उम्र 80 साल है। ये इस गांव की आर्टिजनों में सबसे बुजुर्ग है। सबसे पहले इन्होंने ही गांव से बाहर जाकर दूसरे शहरों में हैंडीक्राफ्ट की बारीकियों को समझा और गांव में आकर महिलाओं को जोड़ा। जीवन के आठवें दशक में में भी बारी काम कर रही है। इनका काम के प्रति जज्बा और जोश देखते ही बनता है।

सकारात्मक सोच के साथ गांव की दूसरी महिलाओं को अपने साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करती है। गांव की बहुओं और बेटियों को हैंडीक्राफ्ट की बारीकियां पास में बैठकर सिखाती है। खुद निरक्षर है,लेकिन हुनर में इतनी साक्षर है कि गांव की दूसरी महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना रही है। इसी गांव की 65 साल की हेली। 10 वर्ष की उम्र से ही हैंडीक्राफ्ट का काम कर रही है। मां और दादी के साथ मिलकर यह काम करती थी।

1971 में पाक से विस्थापित होकर आरबी की गफन में आई। यहां पर अपने हुनर को ही आय का जरिया बनाया। पहले ठेकेदार पांच से सात रुपए में भरत के टुकड़े भरने को देते थे। इससे आमदनी तो अधिक नहीं होती थी लेकिन फिर भी काम चलता था। इसके बाद अलग-अलग डिजाइनों को समझा और काम का वाजिब दाम मिलना शुरू हुआ। वर्तमान में श्योर के हैंडीक्राफ्ट के प्रोजेक्ट के साथ सैकड़ों महिलाओं को जोड़कर समूह में काम करती है।

इन महिलाओं में बाजार की समझ विकसित की। देशभर के विभिन्न प्रदर्शनियों में उनके काम को प्रदर्शन करवाया और डिजाइनरों से मिलवाया। अब इनके बनाए हुए डिजाइन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बने हुए है और महिलाओं को उनके काम का वाजिब दाम मिल रहा है।

ये है आर्टिजन सफियत,उम्र 70 साल। भारत-पाक युद्ध के दौरान सफियत अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के मिणाऊ गांव से पलायन कर बॉर्डर के बींढाणी गांव में बसी। सफियत ने अपनी दादी और मां से कशीदाकारी और हैंडीक्राफ्ट का अन्य कार्य सीखा था। इसी को आमदनी का जरिया बनाया। 60 साल से सफियत हैंडीक्राफ्ट का कार्य कर रही है। शुरुआत में महीने के 100 से 150 रुपए मुश्किल से मिलते थे। इसके बाद हैंडीक्राफ्ट की बारीकियां सीखी और मार्केट की भी जानकारी प्राप्त की। अब वर्तमान में अच्छी आमदनी मिल रही है। इसके साथ ही इन्होंने अपनी बहु धीया देवी को भी अपने साथ काम सिखाया। अब पोती लीला भी हैंडीक्राफ्ट का काम कर रही है। लीला बीए की पढ़ाई कर रही है। हैंडीक्राफ्ट के साथ लीला को सिलाई का काम भी सिखाया है।

15 साल की उम्र में सीखी हैंडीक्राफ्ट, अब आत्मनिर्भर लखमा
15 साल की उम्र में सीखी हैंडीक्राफ्ट, अब आत्मनिर्भर लखमा

ये है आर्टिजन लखमा, उम्र 65 वर्ष। आरबी की गफन निवासी लखमा ने 15 साल की उम्र में हैंडीक्राफ्ट का काम अपनी दादी और मां से सीखा। विस्थापन के बाद इन्होंने इसे ही अपनी आय का जरिया बनाया। वर्तमान में श्योर संस्था के समूह के साथ जुड़कर लगाकर महिलाओं को इससे जोड़ रही है। इन्होंने अपनी बहु मांगू को भी हैंडीक्राफ्ट काम सिखाया और अब पोती सुशीला भी यह काम कर रही है। इन्हें मुका, एंब्रायडरी व एप्लिक कार्य करने में कुशलता है। हाथ में सुई धागा आने के बाद इनके काम करने की गति सबसे तेज है। गांव में ही रहकर काम किया और श्योर के माध्यम से विभिन्न एग्जीबिशन व प्रदर्शनियों में अपने प्रोडक्ट को बेचा भी है। वर्तमान में पूरे घर का चलाने में सक्षम है और पुरुषों की आमदनी बचत रहती है।

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