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नवरात्रि पर भास्कर विशेष:भारत-पाक बॉर्डर पर 600 साल पुराने दो देवी मंदिर, अकाल, त्रासदी और युद्धों के साक्षी, हिंदू-मुस्लिम चढ़ाते हैं प्रसाद व करते हैं जोत

बाड़मेर2 महीने पहलेलेखक: लाखाराम जाखड़
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फोटो: नरपत रामावत। - Dainik Bhaskar
फोटो: नरपत रामावत।

आज नवरात्रा स्थापना है और आज हम आपको ऐसे दो देवी मंदिरों के बारे में बता रहे हैं जो भारत-पाक बॉर्डर पर स्थित है और कौमी एकता के मिसाल है। इन दो देवी मंदिरों में रियासत काल से हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल पेश की जा रही है। करीब 600 वर्ष पुराने इन मंदिरों में आज भी हिंदू-मुसलमान एक ही देवी की पूजा करते हैं। ऊनरोड में मां नागणेचियां तो झणकली में शीला माता का मंदिर है। ये दोनों देवियां बाड़मेर-जैसलमेर की सीमा की निशानी भी है, क्योंकि इन्ही देवियों के पीछे जैसलमेर व मारवाड़ रियासत के बीच संघर्ष की कहानियां भी छुपी हुई है। ऊनरोड में नागणेचियां तो झणकली में शीला माता मंदिर है। यहां हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर पूजा करते हैं।

ग्रामीणों को एकजुट करती है उनकी आस्था की देवियां
भारत-पाक बॉर्डर इलाके से सटे बाड़मेर-जैसलमेर में मां नागणेचियां व शीला माता दोनों ऐसी देवियां है, जो 600 साल बाद भी उनकी आस्था के प्रति ग्रामीणों को एकजुट किए हुए है। इनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी, अमीर हों या गरीब, सभी इन मंदिरों में देवी की आस्था के प्रति नतमस्तक होते है। यहां तक की इन मंदिर और धर्मशाला के निर्माण में भी हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदाय ने मिलकर योगदान दिया है। आस्था के साथ ये सामाजिक जुड़ाव रियासतकाल से चला आ रहा है।

ऊनरोड: नागणेचियां माता मंदिर

बाड़मेर-जैसलमेर बॉर्डर पर स्थित ऊनरोड गांव में नागणेचियां माता मंदिर के पीछे की कहानी 600 साल पुरानी है, जब जैसलमेर और मारवाड़ रियासत था। नवरात्रि में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है। 1962 में सूबेदार रेवंतसिंह चंपावत ने यहां छोटे मंदिर बनाया था। इसके बाद 2020 में भव्य मंदिर बनाया गया है। पनू और सेठार मुसलमान थे। उस समय नागणेचिया माता के पुजारी मुस्लिम थे। अब पुजारी चंद्रदास है। यहां हिंदू-मुस्लिम सभी लोग पूजा-अर्चना के लिए आते है। भादवा व माघ की सप्तमी को मेला लगता है। धोधा खां बताते है कि अब यहां 150 घर सेठार और 300 घर पनू मुस्लिम के है। हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ यहां लोग मंदिर में पूजा-पाठ के लिए आते है। जब मेला लगता है तब सभी धर्म जाति के लोग दर्शन के लिए यहां पहुंचते है।

झणकली: शीला माता मंदिर

बाड़मेर जिले के झणकली में शीला माता का भव्य मंदिर है। शीला माता का जन्म 1878 में हुआ। कविराज राजेंद्र दान कहते है कि झणकली चारणों का पुराना सांसण है। कोडा गांव के रतनू शंकरदान सायबदानोत की पुत्री थी शीला। जब जमीन नप रही थी खड़ीन ढाकणिया पर विवाद बढ़ गया है। शीला मां ने विकराल रूप कर लिया। जैसलमेर रियासत के राजा ने सैनिकों काे भेजा, लेकिन शीला माता काे देख मेहर सैनिकों ने भी हथियार डाल दिए। खोखर वंश का खात्मा हो गया। मेहर जिन्होंने हथियार डाले थे वे आज भी मेहरो की ढाणी के नाम से जाने जाते है।उसके बाद वहां 600 बीघा जमीन गोचर कर दी। यहां हिंदू-मुस्लिम दोनों दर्शन करने के लिए आते है। मुस्लिम समाज ने यहां एक धर्मशाला भी बनाई है। मंदिर निर्माण भी हर घर से चंदा आया है।

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