धर्म समाज:राखी गांव के तालाब में 20 फीट गहराई में बना है वाराही माता का मंदिर

राखी2 महीने पहलेलेखक: भेराराम प्रजापत
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समदड़ी तहसील की राखी गांव में आदर्श तालाब के बीचोंबीच स्थित मां वाराही का भव्य मंदिर विख्यात है। सदियों पुराने इस मंदिर को लेकर गांव के रावजी व्याख्याता भंवर सिंह बताते हैं कि सदियों पुरानी बात है। गांव में मारूआ नामक राक्षस रहता था। जो गांववालों को नुकसान पहुंचाता। इस कारण लोग गांव को छोड़कर पहाड़ इलाकों में चले गए। वहां भाखर सुजेरखेड़ा नाम से विख्यात था। वहां पर भक्तों के कष्ट को देखकर मां वाराही प्रकट हुई तथा मारूआ नामक राक्षस का वध किया इसके बाद से राखी गांव में मां वाराही की आराधना की जाती है।

पूर्व सरपंच दुर्गदाससिंह चौहान बताते हैं कि सालों पहले तालाब में ही मां का कच्चा मंदिर बना था। यहां पर मिट्‌टी के बर्तन बनाने वाले आते थे। बारिश के समय मंदिर पानी में डूब जाता था। मां के परचे के कारण मंदिर की कच्ची दीवारों को खरोच तक नहीं आती। यहां पुजारी मगाराम संत आराधना करते थे।

मंदिर तक जाने के लिए सन् 1955-56 में ग्राम पंचायत राखी के प्रथम सरपंच स्व. नाहरसिंह चौहान ने अपने कार्यकाल में 10 फीट की गहराई में बड़े-बड़े सूखे पत्थरों से बिना सीमेंट से एक घाट का निर्माण करवाया था जो वाराही माता घाट के नाम से विख्यात है। 63 वर्षों तक देवीय चमत्कार के कारण यह घाट बिना सीमेंट से बना हुआ खड़ा रहा। इसके बाद ग्राम पंचायत राखी के प्रथम सरपंच नाहररसिंह के पुत्र पूर्व सरपंच दुर्गदाससिंह चौहान ने सन 2018 -19 में अपने सरपंच कार्यकाल में इसी घाट का पक्का जीर्णोद्धार करवाया।

चमत्कारिक परचा

गांववासियों का कहना है कि मां वाराही के दरबार में जिसने भी सच्चे मन से सेवा की है। उसकी मनोकामना पूरी होती है। इसके साथ ही गंभीर बीमारी के दूर होने का दावा भी किया जाता है। अगर किसी के कानों में आज भी दर्द होने लगे अर्थात् किसी के कानों में घाव आने लगे तो माताजी को बेडिया व घुगरी -मातर चढ़ाते ही उसके कान ठीक हो जाते हैं। यह मां का चमत्कारिक परचा है। इसी कारण यहां लोग दूरदराज राजस्थान, थराद, गुजरात से भी धोक लगाने आते हैं।

तालाब के अंदर मंदिर में दर्शन करने जाने के लिए एक पुल का किया निर्माण
जानकार बताते हैं कि सन् 1991-92 में मंदिर में दर्शन करने गए दुर्गाशंकर महाराज व राखी के जैन मंदिर में बाहर से आए हुए नक्काशी कारीगर सोमपुरा ने मंदिर में रखी अन्य खंडित मूर्तियों को बाहर विराजित करके केवल माता जी की मूर्ति को अंदर विराजित कर निर्माण की बात कही। दुर्गा शंकर महाराज व चंपालाल जैन ने यह सुझाव सेठ मंगनीराम सिंघवी को बताया। तब सन् 1991-92 में सेठ मंगनीराम सिंघवी ने इस मंदिर की नींव रखी गई। मंदिर की आकृति फिलिप्स की तरह है। जिससे बहता हुआ पानी मंदिर से टकराकर वापस उस दिशा में जाता है ताकि मंदिर को कोई क्षति नहीं पहुंचती।

इस मंदिर के निर्माण का कार्य गजदर रतनचंद सोनी ने किया था। यह मंदिर तालाब के बीचों-बीच 20 फीट की गहराई में बना हुआ है। कई बार तो मोकलसर की पहाड़ियों से आने वाले पानी से इस मंदिर पर बने हुए लोहे के पिलर डूब जाते हैं। फिर भी पुजारी छगनदास संत द्वारा सुबह- शाम पूजा -आरती की जाती है। तालाब के अंदर मंदिर में दर्शन करने व पूजा करने जाने के लिए एक पुल का निर्माण किया हुआ है।

राखी गांव में माता मंदिर में पिछले 23 साल से चल रहा है गरबा महोत्सव

माता का मंदिर होने से यहां पर 1994 में क्षेत्र में पहला गरबा महोत्सव राखी गांव से शुरू किया गया था। दुर्गाशंकर महाराज, हरिदान राव व पंडित हीरालाल शास्त्री गरबा महोत्सव का आयोजन करवाया। सन् 1994 से लगातार सन् 2017 तक 23 वर्षों तक गरबा कार्यक्रम चला। अब कोविड-19 की वजह से गरबा कार्यक्रम बंद है। 23 वर्षों के इस गरबा कार्यक्रम के व्यवस्थापक पूर्व सरपंच दुर्गदाससिंह चौहान रहे। गरबा महोत्सव देखने के लिए यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।

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