भास्कर एक्सक्लूसिव:साबरमती गांधी आश्रम से राजघाट साइकिल यात्रा पर निकले 73 वर्षीय स्पिक मैके फांउडर पद्मश्री प्राे. किरन सेठ से भास्कर की खास बातचीत

बयानाएक महीने पहले
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प्राे. सेठ बोलें- पश्चिम संस्कृति ने खत्म न होने वाली भूख बढ़ाई, गांधीजी के सिद्धांत संताेषी सदा सुखी... में ही खुशी खाेजनी हाेगी; ग्लोबल डिस्टरबेंस पर बोले पद्मश्री सेठ... मौसम और परिस्थितियां बदल रही हैं, अब नहीं बदले तो पर्यावरण सब कुछ बदल देगा - Dainik Bhaskar
प्राे. सेठ बोलें- पश्चिम संस्कृति ने खत्म न होने वाली भूख बढ़ाई, गांधीजी के सिद्धांत संताेषी सदा सुखी... में ही खुशी खाेजनी हाेगी; ग्लोबल डिस्टरबेंस पर बोले पद्मश्री सेठ... मौसम और परिस्थितियां बदल रही हैं, अब नहीं बदले तो पर्यावरण सब कुछ बदल देगा

पर्यावरण और गांधी दर्शन से मानवीय रिश्ते काे मजबूत करने के लिए 73 वर्षीय पद्मश्री डॉ. किरण सेठ इन दिनों साइकिल से साबरमती गांधी आश्रम (गुजरात) से राजघाट (दिल्ली) की साइकिल यात्रा पर निकले हैं। वे शुक्रवार काे बयाना में थे। भास्कर से बातचीत में डॉ.किरण सेठ ने कहा परिस्थितियां और मौसम बदल रहे हैं। गर्मी यह सब क्यों हो रहा है, इस पर विचार करना जरूरी है। यदि हम अब भी नहीं बदले तो पर्यावरण सब कुछ बदल देगा। वेस्ट और बेस्ट के चयन का समय चल रहा है। हमने वेस्ट/पश्चिम कल्चर देखा, जाे हमारे चारों तरफ है, इसमें हम बहुत कुछ खोते जा रहे हैं। रोज नए लक्ष्य, कभी न खत्म होने वाली भूख है। वहीं हमारी संस्कृति और संस्कार हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सिद्धान्त हैं कि जो हमारे पास है हम उसी में खुशी खोजते हैं। संतोषी रहते हुए अच्छे रहते हैं। पद्मश्री प्राे. किरण सेठ शनिवार काे भरतपुर आएंगे।

शिक्षा प्रणाली में ब्रॉड विजन वाले बच्चों को प्रोत्साहित करने की जरूरत, रोज आधा घंटा कल्चरल एक्टिविटीज जरूर कराएं
भास्कर: गांधीजी के विचार और दर्शन कितने प्रासंगिक हैं?
A. गांधीजी के विचार और दर्शन आज भी प्रासंगिक हैं। जरूरत केवल उन्हें समझने की है। गांधी जी के विचारों से व्यक्ति अपने जीवन की उथल-पुथल को काफी हद तक कम कर सकता है और समाज के विकास में अपना योगदान दे सकता है।

भास्कर: गांधी दर्शन को सरकारों ने कितना स्वीकारा। A. इसमें सरकारों को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं। विजन शार्ट टर्म होता है। पब्लिक की जिम्मेदारी अधिक है। सरकारें चाहें भी तो तब तक गांधीजी के विचार लागू नहीं कर सकती, जब तक कि समाज इसके लिए तैयार नहीं हो। आज कोई लंगोट में पैदल नहीं चलना चाहता। सब सूटेड- बूटेड होकर बीएमडब्ल्यू में जाने की इच्छा है नेता भी तो सोसायटी से ही निकलते हैं।

भास्कर: विकास की दशा और दिशा क्या हो सकती है? A. समाज और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता। राजनीति, सोसायटी का सीधा प्रतिबिंब है। सोसाइटी के कार्य और उनकी इच्छा राजनीति में परिलक्षित होती है। आजकल के युवाओं में सहनशीलता की काफी कमी है। शिक्षा प्रणाली में ब्रॉड विज़न वाले बच्चों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। प्रतिदिन आधा घंटा कल्चरल एक्टिविटीज के लिए दें।

भास्कर: क्या शिक्षा प्रणाली को बदलने की जरूरत है? A. एजुकेशन सिस्टम को तो बदलना काफी मुश्किल भरा होगा, लेकिन गुरुकुल की अवधारणा को अंतर स्थापित किया जा सकता है। परा और अपरा विज्ञान के बीच बैलेंस बनाना जरूरी है। आज छोटे-छोटे बच्चे भी डिप्रेशन में जा रहे हैं। स्टूडेंट और टीचर के रिश्ते को वृहद बनाने की जरूरत है।

भास्कर: शास्त्रीय संगीत के क्या फायदे हैं? A. भारतीय शास्त्रीय संगीत से तनावमुक्ति के साथ ही काम के प्रति एकाग्रता बढ़ती है। चार घंटे के काम आधा घंटे में करने लगेंगे। ब्रीदिंग एक्सरसाइज करें। शास्त्रीय संगीत के रेगुलर रियाज और मेडिटेशन की बदौलत ही में 73 साल की उम्र में लंबी साइकिल यात्रा कर पा रहा हूं। इससे कंसंट्रेशन के साथ ही एनर्जी भी मिलती है।

भास्कर: शास्त्रीय संगीत संरक्षण के लिए सरकारों के प्रयास पर्याप्त हैं? A. अधिकतर सरकारों ने संस्कृति को लो प्रोफाइल पर रखा है। मंत्रिमंडल गठन में नेता लोग गृह, रक्षा, वित्त जैसे अहम माने जाने वाले विभागों को लेने के लिए अधिक लालायित रहते हैं। संस्कृति मंत्रालय को हार्डशिप पोस्टिंग के तौर पर देखा जाता है। सच बोलूं तो संस्कृति मंत्रालय के अधिकतर मंत्री कल्चर के बारे में बहुत कम जानते हैं।

भरतपुर में स्पिक मैके के 20 साल में 280 कार्यक्रम
स्पिक मैके संस्था देश के 500 शहरों और विदेश में 50 स्थानों पर 5000 से अधिक कार्यक्रम कर चुकी है। भरतपुर में 20 साल से संस्था सक्रिय है अाैर अब तक करीब 280 कार्यक्रम हाे चुके हैं। संस्था के कार्यक्रमों में प्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना सहित कई राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित हस्तियां भी शामिल हो चुकी हैं।

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