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बयान:सच्ची मित्रता की मिसाल है कृष्ण और सुदामा की दोस्ती : आचार्य योगेश तिवारी

धौलपुर4 महीने पहले
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कस्बे के बामनी नदी आश्रम पर चल रही भागवत कथा के सातवें दिन कृष्ण - सुदामा की मित्रता का प्रसंग हुआ। कृष्ण के द्वारकाधीश बनने के बाद भी सुदामा जैसे गरीब ब्राह्मण होने पर भी मित्रता को सर्वोपरि मान मित्र धर्म को निभा कृष्ण ने कृष्ण सुदामा की मित्रता को अमर कर दिया।

कथावाचक पं. योगेश तिवारी शास्त्री ने बताया कि बचपन में कृष्ण और सुदामा एक ही गुरुकुल में पढ़ते थे और दोनों गहरे मित्र थे। कालांतर में दोनों ही शिष्य बड़े हुए तो कृष्ण द्वारकाधीश जैसे महान शासक बने तो सुदामा बेहद ही गरीब ब्राह्मण के रूप में जाने गए। गरीब ब्राह्मण होने पर भी सुदामा ने कभी भी अपने धर्म को नहीं छोड़ा और निरंतर श्री कृष्ण के चरणों में अपने ध्यान को लगाए रखा।

अधिक दरिद्रता के कारण सुदामा की पत्नी ने एक बार सुदामा को प्रेरित कर कहा कि बच्चे कई दिनों से भूखे हैं और आपके मित्र द्वारकाधीश है क्यों ना आप स्वयं एक बार द्वारकाधीश से मिलने जाएं ताकि हमारी दरिद्रता समाप्त हो सके।

सुदामा ना चाहते हुए भी कृष्ण के दरबार में पहुंचे जहां द्वारपालों ने अंदर जाने से मना कर दिया। सुदामा ने कहा कि जाकर कृष्ण से कहो कि सुदामा आया है द्वारपालों ने जाकर कृष्ण से कहा कि सुदामा आया है तो स्वयं कृष्ण सिंहासन से उठकर दौड़े चले आए और कृष्ण द्वारा सुदामा को गले लगाकर मित्रता का परिचय दिया।

इसके बाद मित्र प्रेम में कृष्ण ने अपने आंसुओं से ही सुदामा के पैर धोए। संध्या का समय होने पर कृष्ण सुदामा एक दूसरे के पास बैठे हुए थे लेकिन सुदामा कृष्ण का वैभव देखकर उपहार में लाए चावल की पोटली को देने में सकुचाने लगे लेकिन कृष्ण जानते थे कि सुदामा कुछ ना कुछ उपहार में जरूर लाए होंगे इसी कारण उन्होंने सुदामा से प्रश्न किया कि भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है लेकिन सुदामा समझाते हुए पोटली को छुपाने लगे लेकिन ट्रस्ट ने जबरदस्ती पोटली को छीना और चावलों में से एक मुट्ठी चावल अपने मुंह में डाल दिए और 1 लोक का वैभव सुदामा को दे दिया दूसरी मुट्ठी चावल कि मुंह में डालने पर दूसरे लोक का वैभव भी सुदामा को दे दिया, लेकिन जैसे ही तीसरी मुट्ठी चावल कृष्ण अपने मुख में डालने लगे तो रुकमणी ने उन्हें रोक दिया और कहा भी कुछ तो अपने लिए रहने दीजिए। प्रभु की यह कथा सिखाती है कि मित्रता सदैव संपन्नता में नहीं रहनी चाहिए बल्कि विपन्नता और दुख में भी साथ रहने का नाम है।

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