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कुम्हेर का इतिहास:17वीं शताब्दी में इस किले के दम पर मुगल आक्रांता अब्दाली को दी थी महाराजा सूरजमल ने चुनौती

कुम्हेर9 दिन पहलेलेखक: राहुल फौजदार
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कुम्हेर का किला 17 वीं शताब्दी में बेहद मजबूत किले में शुमार था। मुस्लिम आक्रांता अहमद शाह अब्दाली को भरतपुर महाराजा सूरजमल ने इसी किले की फौलादी शक्ति के दम ही चुनौती दी थी। क्योंकि कुम्हेर के किले ने अपनी मजबूती और अजेयता हर बार साबित की थी। यही वजह थी कि अहमदशाह अब्दाली के आक्रमण के समय और खांडेराव होलकर के आक्रमण के समय सूरजमल ने इसी किले के प्राचीरों को ही सुरक्षित समझा।

इतिहासकार रामवीर सिंह के अनुसार दिल्ली को बुरी तरह रौंद कर अब्दाली मथुरा की ओर बढ़ा था। अब्दाली उनसे धन वसूलना चाहता था। वह भरतपुर राज्य पर हमले के इरादे से ही दिल्ली से आगे बढ़ा था। वक्त की नाजुकता देखकर महाराजा सूरजमल ने कुम्हेर के किले में रहकर अब्दाली का सामना करने की तैयारी की थी। अब्दाली ने सूरजमल से धन की मांग की। बदले में सूरजमल ने उसे चुनौती दी कि वह उस पर आक्रमण करे।

सूरजमल को कुम्हेर के किले की मजबूती पर इतना भरोसा था कि उसने अब्दाली से यह तक कह दिया कि आप आक्रमण करो ताकि मेरे किले की मजबूती की परीक्षा हो सके। अब्दाली इस किले पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर पाया। इस किले का नाम महारानी किशोरी के नाम पर किशोरी महल रखा गया था। भरतपुर के किले में भी किशोरी महल है। इस किले की नींव महाराजा सूरजमल ने 1726 ईस्वी में रखी थी। यह किला करीब आठ वर्ष में बनकर पूर्ण हुआ। यह किला सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण था।

सूरजमल के समय पर यहां रहकला, हथनाल, गजनाल, सुतरनाल और जुजर्वा आदि हथियार ढाले जाते थे। इस किले की बाहरी दीवारें इतनी ऊंची और मजबूत थीं कि दुश्मन के पास इन्हें तोड़ने लायक तोपें ही नहीं थीं। इस किले के अंदर भूमिगत अस्तबल भी था जहां युद्ध के समय घोड़े भी सुरक्षित रह सकते थे। दीवार के अंदर इतना क्षेत्र आता था कि आज यहां एक विद्यालय, तहसील भवन और कोर्ट आदि यहां बने हुए हैं। किले के पीछे कुएं वाली चामड़ (देवी) का मन्दिर है। किले के पीछे पक्का तालाब है। इस तालाब के किनारे तीन मंजिला जलमहल बने हुए हैं। इस तालाब के दूसरे तट पर भैरव का एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर बना है। इन जल महलों की मरम्मत का कार्य अभी चल रहा है।

सात मंजिला का है महल, दो मंजिल में तहखाने हैं
यह किला सात मंजिल का है। इन सात मंजिलों में से चार मंजिलें तो घूमने के दौरान आसानी से दिखती हैं। एक मंजिल नीचे तहखाने में भी दिखाई देती है। ऐसे में इसकी पांच मंजिलें तो हर पर्यटक देख सकता है। जानकारों का कहना है कि इस किले में सात मंजिल हैं। शेष दो मंजिलें भी भूमिगत तहखानों में हैं। इस किले में कुल सात विशाल आंगन हैं। इन आंगनों को चौक कहते हैं। हर चौक के चारों ओर चार मंजिला भवन बने हुए हैं। इन भवनों की खासियत यह है कि ये सातों चौक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। यानी यहां रहने वाला व्यक्ति कभी भी महल के किसी भी हिस्से से दूसरे हिस्से में आ जा सकता था।

मराठों के घमंड को इसी किले ने किया था चूर
इस किले की एक बार मराठों ने घेराबंदी की। मराठों के सरदार मल्हार राव होलकर के पुत्र खांडेराव होलकर के नेतृत्व में यह अभियान हुआ। खांडेराव बड़े ही घमंड के साथ दक्षिण से आया था। वह इस किले को ध्वस्त करके सूरजमल को पराजित करना चाहता था। लेकिन जब वह यहां पहुंचा तो मैदान में बने इस किले की सपाट दीवारों की ऊंचाई और मजबूती देखकर दंग रह गया। उसने किले की घेराबंदी की।

महाराजा सूरजमल उस समय इसी किले में थे। खांडेराव ने किले के चारों तरफ खन्दक खुदवाई। इस खंदकों में तोपें रखकर किले पर गोले बरसाए गए। पर इन गोलों की मार किले को नुकसान नहीं पहुंचा पाई। महीनों के घेरे के बाद एक दिन खांडेराव खंदकों का निरीक्षण करने निकला। उसी समय कुम्हेर के किले से एक तोप ने गोला दाग दिया। गोला सीधे जाकर खांडेराव की पालकी में लगा और खांडेराव की मौत हो गई।

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