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उपभोक्ता मंच का फैसला:गलत एडमिशन देकर छात्र के 4 साल खराब, कॉलेज पर दो लाख का हर्जाना

भरतपुर4 दिन पहले
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  • विश्वविद्यालय के मना करने पर भी 6 सेमेस्टर पढ़ाए

शहर के कॉलेज ने पहले तो ओवर एज होने के बावजूद छात्र को एडमिशन दे दिया। यूनिवर्सिटी ने प्रवेश निरस्त करने की सूचना भेजी तो फीस लेकर विद्यार्थी को पढ़ाता रहा। ऐसे में छात्र के चार साल खराब हो गए। जिला उपभोक्ता आयोग ने कॉलेज हर्जाने के तौर पर दो लाख रुपए पीड़ित छात्र को देने के आदेश दिए हैं। साथ ही फीस और परिवाद व्यय के कुल 1.55 लाख रुपए भी लौटाने होंगे।

प्रकरण के अनुसार कृष्णा नगर निवासी प्रशांत चौधरी ने 2011 में डालमिया डेयरी के सामने स्थित चंद्रावती ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन में एडमिशन लिया। उस समय छात्र ने अपनी जन्म दिनांक वाली दसवीं की अंकतालिका सहित सभी दस्तावेज जमा कराए। कॉलेज को चार साल में बैचलर इन होटल मैनेजमेंट एंड कैटरिंग टैक्नोलॉजी डिग्री करानी थी।

कॉलेज छह सेमिस्टर तक छात्र से फीस लेकर पढ़ाई और ट्रेनिंग कराता रहा। साथ में राजस्थान टेक्नीकल यूनिवर्सिटी परीक्षा लेकर अंकतालिकाएं जारी करती रही। सातवें सेमिस्टर में फीस जमा कराने पर उसे एडमिशन कार्ड जारी नहीं किया गया। बाद में सातवें सेमिस्टर की फीस लौटा दी गई।

साथ ही छात्र को बताया गया कि इस डिग्री को करने के लिए ओवर एज है। ऐसे में उसे परीक्षा में शामिल नहीं किया जा सकता। उसने कॉलेज प्रबंधन और विश्वविद्यालय से संपर्क किया लेकिन कोर्स पूरा करा प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया। छात्र के चार साल और फीस के बतौर एक लाख 45 हजार रुपए बेकार हो गए। इस पर उसने जिला उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग के सामने कॉलेज ने सफाई दी कि एडमिशन विश्वविद्यालय के दिशा-निर्देशानुसार दिए जाते हैं।

आयु सीमा में छूट के लिए छात्र से ओबीसी का प्रमाण पत्र मांगा गया था जो उसने उपलब्ध नहीं कराया। दूसरी ओर यूनिवर्सिटी ने ही प्रवेश पत्र जारी किया। वही अंकतालिकाएं भी जारी करता है। ऐसे में कॉलेज की कोई गलती नहीं है। दूसरी ओर विश्वविद्यालय ने दलील दी कि की नियमानुसार एडमिशन देने की जिम्मेदारी कॉलेज की है। नियमानुसार एडमिशन के वक्त आवेदक की आयु 25 वर्ष से ज्यादा नहीं होनी चाहिए, जबकि छात्र 28 वर्ष का था।

ऐसे में प्रोविजनल नामांकन निरस्त होने की सूचना कॉलेज को नवंबर 2012 में ही दे दी गई थी। बाद में अप्रेल और जुलाई 2015 में भी इंस्टीट्यूट को इस संबंध में सूचित किया गया। इसके बावजूद कॉलेज और छात्र ने मिलीभगत कर अध्ययन जारी रखा और परीक्षाएं दी। यूनिवर्सिटी ने छात्र से फीस नहीं ली है। ऐसे में उसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।

सभी पक्षों को सुन अध्यक्ष सत्यजीत राय, सदस्य दीपक मुदगल और सविता सिंघल ने फैसला किया। जिसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सरकारी विश्वविद्यालय का काम गैर व्यापारिक गतिविधियों की श्रेणी में आता है। ऐसे में वह सेवाप्रदाता नहीं माना जा सकता। कॉलेज फीस लेकर पाठ्यक्रम चलाता है। ऐसे में व्यापारिक गतिविधियों की श्रेणी में आता है।

यूनिवर्सिटी ने छात्र को ओवरएज बताते हुए नवंबर 12 में ही प्रवेश निरस्त करने के लिए कॉलेज को लिख दिया था। इसके बावजूद महाविद्यालय छह सेमिस्टर तक फीस लेता रहा और पढ़ाता रहा। उसने पीड़ित छात्र को सूचित भी नहीं किया। ना ही ऐसा ही विश्वविद्यालय द्वारा ओबीसी को आयु सीमा में छूट दिए जाने संबंधी नियम भी आयोग के सामने पेश नहीं किया।

कॉलेज का सेवा दोष प्रमाणित है। इससे पीड़ित के अमूल्य चार साल नष्ट हो गए। ऐसे में इंस्टीट्यूशन विशेष हर्जाने के तौर पर छात्र को दो लाख रुपए दे। इसके अलावा कोर्स फीस के 1.45 लाख रुपए और परिवाद व्यय के तौर पर 10 हजार रुपए का भुगतान करे।

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