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चामुंडेश्वरी मंदिर:युद्ध पर जाने से पहले राजा मांगते थे विजयश्री का आशीर्वाद,आज आप भी दर्शन कीजिए

भरतपुरएक महीने पहले
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  • अभी तक झील का बाड़ा कैलादेवी मंदिर को ही माना जाता रहा है सबसे प्राचीन, भरतपुर स्थापना के साथ ही किला परिसर में बनाया गया था मंदिर

सामान्य जन में आम धारणा है कि झील का बाड़ा स्थित कैलादेवी मंदिर जिले में सबसे पुराना है। लेकिन, अगर इतिहासकारों की मानें तो किला परिसर स्थित चामुंडा देवी मंदिर उससे भी पुराना है। करीब 300 साल पहले भरतपुर की स्थापना के समय इस मंदिर का निर्माण कराया गया था। इसलिए इसकी बनावट भी सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। बताते हैं कि महाराजा सूरजमल और महाराजा जवाहर सिंह युद्ध अभियानों पर जाने से पहले चामुंडेश्वरी देवी की आराधना और विजयश्री के लिए अनुष्ठान करते थे। चामुंडा देवी मंदिर किला स्थित राजकीय संग्रहालय गेट के बाहर कॉर्नर पर स्थित है।

राजघराने से जुडे़ काका रघुराजसिंह ने बताया कि इस मंदिर का निर्माण किले में बने बिहारीजी मंदिर के साथ ही हुआ था। चूंकि चामुंडा देवी को युद्ध की देवी माना गया है। इसलिए युद्ध अभियानों पर जाने से पहले महाराजाओं द्वारा यहां दर्शन करने की परंपरा थी। राजतिलक के समय और दशहरा एवं बसंत पंचमी पर लगने वाले विशेष दरबार के समय भी महाराजा दर्शन करने जाते थे।

उन्होंने बताया कि रियासत काल में चामुंडेश्वरी देवी के बाद खिरनी घाट स्थित राजराजेश्वरी देवी मंदिर में भी दर्शन, पूजा और अनुष्ठान करने का उल्लेख मिलता है। यह कोठी खास से चौबुर्जा, कुम्हेर गेट होते हुए अखड्ड पहुंचता था, जहां शमी के पेड़ की पूजा होती थी।

इतिहासकार रामवीर सिंह वर्मा ने बताते हैं कि राज राजेश्वरी देवी की स्थापना चामुंडा देवी मंदिर के बाद हुई। जबकि झील का बाड़ा कैला देवी पूजा वर्ष 1920 में शुरू होने का उल्लेख है। चामुंडा देवी की प्रतिमा राजघराने के सिनसिनी गांव से लाई गई थी।

पिंडी स्वरूप में है चामुंडा देवी की प्रतिमा

चामुंडा देवी की प्रतिमा पिंडी स्वरूप में है। उनके बगल में त्रिशूल है। ज्योतिषाचार्य राम भरोसी भारद्वाज के अनुसार चामुंडा देवी मंदिर मुख्यतया माता काली को समर्पित है। काली शक्ति और संहार की देवी है। असुर चंड-मुंड का संहार करने के कारण माता का नाम चामुंडा पड़ा। इसीलिए युद्ध के समय महाराजाओं द्वारा चामुंडा देवी की पूजा और आराधना की जाती थी। चूंकि माता का स्वरूप क्रोध और वीभत्स है। इसलिए भरतपुर सहित अनेक जगह चामुंडा माता का स्वरूप पिंडी स्वरूप में है। पिंडी को माता का आदि स्वरूप माना जाता है।

मंदिर में बुर्ज और चौकी भी बने हैं

चामुंडा देवी मंदिर का निर्माण सामरिक महत्व को इंगित करता है। यहां बुर्ज और जालीदार पिलर से सुरक्षा चौकी भी बनी है। यह करीब 10 फीट ऊंची हैं। मंदिर के पुजारी ओमप्रकाश शर्मा ने बताया कि उसकी चार पीढ़ी इस मंदिर में मां चामुंडा देवी की पूजा-अर्चना करती आ रही हैं।

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