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  • Corona Becomes Bigger Than Ravana, Effigy Burning Will Not Happen For The First Time In 115 Years, It Is Necessary To Stop This Epidemic

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विजयादशमी आज:रावण से बड़ा हो गया कोरोना, 115 साल में पहली बार नहीं होगा पुतला दहन, इस महामारी को रोकना जरूरी

भरतपुरएक महीने पहले
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  • संक्रमण के डर से न रामलीला हुई और ना ही नुमाइश लगी
  • अब तक हमारे 92 लोगों की जान ले ली, 5547 लोग हो चुके हैं संक्रमित

इस दशहरा रावण को नहीं बल्कि कोरोना को मारिए। क्योंकि इसका कद रावण से भी बड़ा हो गया है। इसीलिए आज जसवंत प्रदर्शनी (नुमाइश मैदान) और गांधी पार्क में रावण पुतला दहन के कार्यक्रम नहीं होंगे। कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए रामलीला कमेटी और जिला प्रशासन पहले ही यह कार्यक्रम रद्द कर चुके हैं।

पिछले 115 साल में पहली बार विजयादशमी पर पुतला दहन की परंपरा टूटेगी। कोरोना संक्रमण की वजह से ही पहली बार रामलीलाओं का मंचन भी नहीं हुआ है। यहां तक कि 21 से 30 अक्टूबर तक चलने वाली नुमाइश भी नहीं लगी है। पशुपालन विभाग के संयुक्त निदेशक एवं मेला अधिकारी डॉ. नगेश चौधरी ने बताया कि दशहरा मेला में सोशल डिस्टेसिंग नहीं रह पाती इसलिए राज्य सरकार ने इस तरह के आयोजनों पर रोक है।

उल्लेखनीय है कि भरतपुर में अप्रैल से ही कोरोना संक्रमण फैला हुआ है। अब तक जिले में 92 लोगों की मौत हो चुकी है और 5547 लोग पॉजिटिव हो चुके हैं। इनमें 31 कोरोना संक्रमित रोगी शनिवार को ही मिले हैं। हालांकि हमारे यहां रिकवरी रेट 95 प्रतिशत तक बनी हुई है।

अब तक 5259 लोग ठीक हो चुके है। इनमें 59 लोग शुक्रवार को ही ठीक हुए हैं। आरबीएम अस्पताल के पीएमओ डॉ. नवदीप सिंह के मुताबिक कोरोना को हराने के लिए जरूरी है कि हम बिना मास्क घर से बाहर ही न निकलें। सार्वजनिक स्थानों पर एक-दूसरे से 2 गज की दूरी बनाकर रखें। बार-बार साबुन से हाथ धोएं और सेनेटाइज करें। खांसी-जुकाम, बुखार जैसे लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल में अपनी कोरोना जांच कराएं।

25 फुट से हुई शुरुआत, 55 फुट तक बढ़ा कद

वर्ष 1905 में जब रावण पुतला दहन कार्यक्रम शुरू हुआ था, तब पुतले की ऊंचाई कितनी रही होगी, इस बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन, श्री रामलीला समिति अध्यक्ष बृजेश कौशिक के मुताबिक करीब 20 साल पहले 25 फुट का पुतला दहन किया गया था।

इसके बाद हर साल इसका कद बढ़ता रहा और वर्ष 2019 में 50 फुट का पुतला दहन किया गया। वहीं जिला प्रशासन द्वारा पशुपालन विभाग के सहयोग से वर्ष 2005 से लोहागढ़ स्टेडियम में नुमाइश के दौरान 40 फुट के पुतले से रावण के दहन की परंपरा शुरू हुई थी।

पुतले पर एक लाख रुपए तक होते हैं खर्च : आयोजकों के मुताबिक रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले बनाने में 1 से 1.25 लाख रुपए तक का खर्च आता है। लोहागढ़ स्टेडियम में दशहरा मेला देखने 10 से 15 हजार लोग आते हैं। वहीं गांधी मैदान में भी भीड़ जुटती है।

दो रावण दहन की है परंपरा : शहर में रावण के दो पुतले गांधी पार्क और नुमाइश मैदान में दहन की परंपरा है। इनमें श्री रामलीला समिति की ओर से पुतला दहन कार्यक्रम सबसे पुराना है। इसकी शुरुआत वर्ष 1905 में राजमाता गिर्राज कंवर ने अखड्ड मैदान में की थी।

एक्सपर्ट व्यू पटाखों के धुएं से वातावरण में खत्म होती है ऑक्सीजन: गुप्ता

  • आतिशबाजी के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों में आम तौर पर तेज आवाज करने वाले बम आदि पटाखे आदि लगाए जाते हैं। एक छोटा पटाखे से निकला धुंआ करीब 10 लीटर और बड़े पटाखे से 100 लीटर ऑक्सीजन खत्म हो जाती है। इससे सेहत को नुकसान होता ही है। अस्थमा के रोगियों की तो दम घुटने जैसी स्थिति हो जाती है। कोरोना रोगी की भी सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है, क्योंकि यह फेफड़ों पर सीधा असर करता है। - डॉ मुकेश गुप्ता, विभागाध्यक्ष मेडिसन, गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज भरतपुर

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