दर्द ए कोरोना / मजदूर हूं, मजबूर भी! बच्चा विकलांग है, माफ करना, आपकी साइकिल ले जा रहा हूं

I am a laborer, forced too! Child is disabled sorry i'm taking your bicycle
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  • चिट्ठी पढ़ने के बाद साइकिल मालिक साहब सिंह की आंखें भर आईं
  • चोरी की रिपोर्ट लिखाने का इरादा ही बदल दिया

दैनिक भास्कर

May 15, 2020, 09:24 AM IST

भरतपुर. एक बेबस और लाचार पिता की मजबूरी कैसे ईमान को डिगाती है और उसे कसूरवार बना देती है। इसे बरेली के मोहम्मद इकबाल की इस चिट्ठी से महसूस किया जा सकता है। मोहम्मद इकबाल का कसूर ये है कि उसने अपने दिव्यांग बेटे के लिए रारह से एक साइकिल चुरा ली। लेकिन, उसका ईमान भी देखिए। यह चोरी करने के साथ ही उसने साइकिल मालिक के नाम चिट्ठी लिखी और उसके घर में छोड़ गया। उसमें लिखा है कि मैं आपका कसूरवार हूं। लेकिन, मजदूर हूं और मजबूर भी। मैं आपकी साइकिल लेकर जा रहा हूं। मुझे माफ कर देना। मेरे पास कोई साधन नहीं है और विकलांग बच्चा है। मुझे बरेली तक जाना है। साइकिल के मालिक का भी बड़प्पन देखिए जब, बरामदे में झाड़ू लगाते वक्त मिली यह चिट्ठी पढ़ी तो उसकी आंखें भर आईं। उसने तत्काल ही साइकिल चोरी की पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने का इरादा ही बदल दिया।

जी हां, बरेली का मोहम्मद इकबाल उन हजारों प्रवासी मजदूरों में से ही एक था, जो परिजनों से मिलने की चिंता में भूख,-प्यास, चिलचिलाती धूप और पैरों में फटी बिवाई की चिंता किए बगैर अपने शहर और गांव पहुंचने की जद्दोजहद में हाइवे पर चल रहे हैं। रारह राजस्थान और उत्तर प्रदेश के बीच सीमाई (बार्डर) ग्राम पंचायत है। पिछले 22 मार्च से ही रोजाना सैकड़ों प्रवासी मजदूर यहां से पैदल ही उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल, झारखंड आदि राज्यों के लिए बॉर्डर क्रॉस कर रहे हैं। मोहम्मद इकबाल भी मंगलवार की रात पास ही सहनावली गांव में आकर रुका था। जो बुधवार सुबह साइकिल लेकर अपनी मंजिल पर रवाना हो गया।

इकबाल की चिट्ठी पढ़ने के बाद साइकिल के मालिक साहब सिंह बताते हैं कि बरामदे में खड़ी साइकिल जब सुबह नहीं मिली तो चिंता हुई। काफी खोजबीन भी की। लेकिन, झाड़ू लगाते वक्त बरामदे में मिला कागज का टुकड़ा पढ़ने के बाद चोरी होने का जो आक्रोश और चिंता दिल में थी। वह अब संतोष में बदल गई है। मेरे मन में साइकिल ले जाने वाले मोहम्मद इकबाल के प्रति अब कोई द्वेष नहीं है। बल्कि तसल्ली इस बात की है कि मेरी साइकिल सही मायने में किसी को दर्द का दरिया पार करने में काम आ रही है। यही सोचकर ही मेरा सीना प्रफुल्लित है। साहबसिंह कहते हैं कि मजबूर और लाचार मोहम्मद इकबाल ने बेबसी में यह दुस्साहस किया। अन्यथा बरामदे में और भी कई कीमती चीजें पड़ी थी, जिन्हें उसने हाथ भी नहीं लगाया। मोहम्मद इकबाल कहां से आया था। क्या करता था। कौन साथ में था। बरेली में कहां जाना था। इसका पता नहीं चल सका।

इधर... मिन्नतें कर कबाड़ी से खरीदीं 5 साइकिलें, झुंझुनूं से बिहार जाएंगे

साइकिल से ही जुड़ी हुई दूसरी कहानी पश्चिम चंपारण बिहार के राजेंद्र शाह, लाल बहादुर, रघुवीर परे और उसके दो साथियों की भी है। ये लोग झुंझुनूं में भजिया (चाट-पकौड़ी) का काम करते थे। दो लॉकडाउन तो उन्होंने इस उम्मीद में गुजार दिए कि फिर से जिंदगी पटरी पर लौट आएगी। लेकिन, तीसरे लॉकडाउन के बाद चिंता गहराने लगी। जो पैसा था वह भी खर्च हो चला था। ऐसे में उन्होंने घर लौटने की सोची। लेकिन, 1130 किलोमीटर का सफर सहज नहीं था। इसलिए उन्होंने कबाड़ी से मिन्नतें कर 1500-1500 रुपए में 5 साइकिलें खरीदीं और 10 मई को वहां से निकल लिए। गुरुवार को भरतपुर पहुंचे। इन 5 दिन के सफर में लगातार साइकिल चलाने से उनकी जंघाएं भर आई हैं। घुटनों में दर्द था। पैरों में सूजन आ गई है। राजेंद्र शाह बोले- साहब पहली बार इतनी साइकिल चला रहे हैं। स्वास्थ्य मंदिर के डॉ. जेपी गर्ग और डॉ. वीरेंद्र अग्रवाल ने उन्हें दवाइयां दी।

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