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अनुसंधान केंद्र:भरतपुर में तैयार किस्में उगल रहीं सोना, सरसों उत्पादन में देश आत्मनिर्भरता की ओर

भरतपुर7 दिन पहले
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  • पिछले 27 साल में सरसों की 300 से ज्यादा किस्में तैयार करने वाला देश में इकलौता है भरतपुर अनुसंधान केंद्र
  • उड़ीसा, प.बंगाल, बिहार, झारखंड, छग और असम के किसानों को पसंद आई डीआरएमआर-150-35 किस्म

राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान केंद्र ने अब तक के 27 साल में 300 से ज्यादा किस्में विकसित की हैं। लेकिन, 4 किस्मों ने देश को सरसों उत्पादन में आत्मनिर्भरता के करीब ला दिया है। कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक हमारी सालाना जरूरत करीब 120 लाख टन सरसों की है। इस साल देश में 90 से 100 लाख टन पैदावार होने का दावा है। इस पैदावार को बढ़ाने महत्वपूर्ण भूमिका भरतपुर केंद्र में विकसित किस्म डीआरएमआर 2017-15 (राधिका), डीआरएमआरआईसी 16-38 (ब्रजराज), डीआरएमआर 1165-40 और डीआरएमआर 150-35 की है।

ये सभी किस्में सिंचित और असिंचित (कम पानी वाले) क्षेत्रों के लिए तैयार की गई हैं। इनमें से डीआरएमआर 150-35 उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में विशेष रूप से पसंद की गई है। इन राज्यों के किसान धान की कटाई के बाद सरसों की इस किस्म को लगाते हैं। यही कारण है कि इन राज्यों में सरसों पैदावार लगातार बढ़ रही है। झारखंड में 71.6, गुजरात में 24.9, छत्तीसगढ़ में 7.4, बिहार में 9, उत्तरप्रदेश में 3.2, राजस्थान में 9.8, हरियाणा में 8.5, मध्यप्रदेश में 11.1 प्रतिशत बुवाई पिछले साल से ज्यादा हुई है।

औसत से 13 लाख हेक्टेयर ज्यादा बुवाई
मस्टर्ड ऑयल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के मुताबिक इस साल 89.5 लाख टन सरसों पैदा होगी। सरसों अनुसंधान केंद्र के निदेशक पीके राय का मानना है कि करीब 100.5 लाख टन सरसों की पैदावार हो सकती है। पिछले साल करीब 73 लाख टन सरसों की पैदावार हुई थी। एग्री वर्ल्ड मुंबई के मुताबिक इस साल 73.89 लाख हैक्टेयर में बोई गई है, जबकि कि पिछले साल 68.84 लाख हेक्टेयर मेेंं बुवाई हुई थी। इसीलिए इस साल औसत से 13.8 लाख हेक्टयेर ज्यादा बुवाई हुई है।

पश्चिम बंगाल में दिया 500 किसानों को प्रशिक्षण
सरसों अनुसंधान केंद्र के निदेशक पीके राय ने बताया कि राज्यों में सरसों का फसल-क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है। असम में धान कटाई के बाद सरसों को बढ़ावा देने के लिए प्रथम पंक्ति प्रदर्शनों के साथ पश्चिम बंगाल के मालदा में 500 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है। सरसों तेल निकालने के लिए लघु मिलें भी लगवाई गई हैं। इसी वर्ष वैज्ञानिकों के अथक प्रयास से चार जनन द्रव्यों का भी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एवं राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो नई दिल्ली से पंजीकरण किया गया है। इनमें सूखा रोधी एवं अधिक तापमान सहने की विशेषता है। राय ने बताया कि भरतपुर सरसों अनुसंधान केंद्र वर्ष 1993 में बना था।

अब तक करीब 300 किस्में विकसित की जा चुकी हैं। सरसों संबंधी अनुसंधान कार्यों के लिए यह देश का एक मात्र केन्द्र है। इस संस्थान में सरसों के अधिक उत्पादन, तेल की मात्रा और विभिन्न जैविक एवं अजैविक कारकों के लिए आधुनिक तकनीक विकसित की जा रही हैं। अब तक सरसों से अछूते रहे गुजरात, झारखंड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़ और असम जैसे राज्यों में भी किसान सरसों की बुवाई करने लगे हैं।

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