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केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी घना उद्यान:500 साल पहले से भरतपुर आते थे साइबेरियन सारस; इनकी वजह से मिली इंटरनेशनल पहचान

भरतपुर5 दिन पहले
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फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
फाइल फोटो
  • साइबेरियन सारस को सी-1625 के नाम से भी जाना जाता है।

बहुत ही कम लोगों को पता होगा कि भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान को इंटरनेशनल स्तर पर पहचान साइबेरियन क्रेन (सारस) की वजह से ही मिली है। भरतपुर से इसका जुड़ाव साल दो साल का नहीं, बल्कि सदियों पुराना है। इसका प्रमाण है मुगल बादशाह जहांगीर के दरबारी चित्रकार उस्ताद मंसूर का बनाया चित्र। जहांगीरनामा पुस्तक के अनुसार उस्ताद मंसूर ने (वर्ष 1590-1624 के बीच ) दरबारी चित्रों के अलावा पक्षियों के भी कई चित्र बनाए थे।

इनमें खास तौर से साइबेरियन सारस का भी हैं। इसे रिकॉर्ड में सी-1625 के नाम से जाना जाता है। फोटो में साइबेरियन क्रेन को बहुत ही खूबसूरती से चित्रित किया गया है। इसके अलावा तुजुक ए जहांगीरी में भी सारस का वर्णन किया गया है। उल्लेखनीय है कि जहांगीर को पक्षियों से काफी प्रेम था। तब मुगलकाल की राजधानी आगरा को राजपूताना और मालवा से जोड़ने का रास्ता रूपवास, बयाना होकर था। भरतपुर कभी यमुना का जलभराव क्षेत्र होता था।

इसका फैलाव रूपवास तक था। इसलिए माना जाता है कि जहांगीर ने जब बयाना का दौरा किया तब प्रवास के दौरान उस्ताद मंसूर ने साइबेरियन क्रेन को देखकर उसका फोटो बनाया होगा। वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर नवीन शर्मा बताते हैं कि मंसूर के चित्र के आधार पर माना जाता है कि भरतपुर में साइबेरियन सारस सहित तमाम देशों से पक्षी यहां आते रहे हैं। साइबेरियन सारस की पहली गणना 1964 में हुई, जिसमें इनकी संख्या 200 थी। लेकिन, बाद में यह सिमटती गई और वर्ष 2001 के आखिरी में 2 साइबेरियन सारस ही आए। भरतपुर के लिए सारस आज भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए सारस को भरतपुर का शुभंकर भी बनाया गया है।

साइबेरियन सारस का पहला चित्र

उस्ताद मंसूर को साइबेरियन क्रेन को चित्रित करने वाले पहला व्यक्ति माना जाता है। उन्होंने इसे साइबेरियन क्रेन को चित्र में नंगे त्वचा, पैरों और पंजे से चिपके एक छोटे पंख पर झुर्रियों को दिखाते हुए बेहद विस्तृत दर्शाया है। इसमें तेल और गोंद का इस्तेमाल किया गया। इसका कोड नेम सी 1625 है। इन कृतियों ने उन्हें नादिर अल आसर का खिताब दिलाया।

सारसों को बचाने की चार देशों ने की थी कोशिश
भरतपुर से साइबेरियन सारसों का रिश्ता कितना अहम था इसे चार देश अमेरिका, जापान, रूस और भारत के वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट के प्रयासों से समझ सकते हैं। 5 दिसंबर 1991 को चार देशों के संयुक्त तत्वावधान में लुप्त हो रहे साइबेरियन सारसों को बचाने के लिए इंटरनेशनल साइबेरियन क्रेन संस्थान के माध्यम से मुहिम शुरू हुई थी। तब बिगुल एवं ब्राइट नामक नर और मादा साइबेरियन क्रेन के बच्चे छोड़ गए। लेकिन, 13 जनवरी 1992 को साइबेरिया से आए 5 सारस उड़कर चले गए और बच्चे उनके साथ घुल-मिल नहीं पाए।
1993 में बोरिस, गोर्वी, बिल क्विंटल और बुशी नाम से चार और बच्चे छोड़े गए। लेकिन, ये भी साइबेरिया नहीं जाए पाए। बाद में इन्हें जयपुर चिड़ियाघर भेजा गया।

जानिये... भरतपुर में कब कितने सारस आए

  • 15 प्रजातियां पाई जाती हैं सारस की विश्वभर में। इनमें व्हाइट नपेड क्रेन, रेड क्राउड, कॉमन, इंडियन सारस, ग्रे क्राउड, बोल्गा, हूपिंग, वेटेल्ड, ब्ल्यू, ब्लैक नेकेड, डोमेसियल, साइबेरियन, होप डेड, सेनधिल तथा ब्लैक क्राउड क्रेन। इसमें से सारस, साइबेरियन, डोमेसियल, कामन क्रेन भरतपुर घना में आती रही हैं।
  • 5000 किमी. का सफर करके यूरेशिया से भरतपुर तक आते थे साइबेरियन सारस। इनकी स्पीड 150 से 200 किमी की थी। इन्हें भरतपुर में पाई जाने वाली साइप्रस रोटैंटंस घास विशेष पसंद थी। प्रवास अक्टूबर से मार्च तक था।
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