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आज जन्माष्टमी:कामां के कदंब खंडी से लाई गई थी बिहारी जी की प्रतिमा

भरतपुरएक महीने पहले
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(प्रमोद कल्याण) भरतपुर के आराध्य देव श्री बांके बिहारीजी का मूल स्थान कामां का कदंब खंडी है। ठाकुरजी की इस प्रतिमा को नागा साधु चतुर चिंतामणि महाराज करीब 250 साल पहले लेकर आए थे। चिंतामणि महाराज निंबार्क संप्रदाय के नागा साधु थे, जो रोजाना ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा करते थे। नागा साधुओं की ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा शुरू करने का श्रेय उन्हीं को है।

लोक मान्यता है कि यह प्रतिमा यमुना जी में स्नान के दौरान चतुर चिंता मणि जी महाराज के पूर्वज संत को मिली थी। उन्होंने भक्ति भाव को देखते हुए चतुर चिंतामणि जी को मूर्ति सौं‌प दी। जिसे वह हमेशा अपने साथ रखते थे। लगभग 17वीं सदी के शुरू में औरंगजेब के शासन काल में ब्रज के मंदिरों को नष्ट, भ्रष्ट किया गया और मारकाट मचाई गई तो नागा बाबा प्रतिमा को लेकर भरतपुर के घने जंगलों में आ गए।

काम्यवन शोध संस्थान के निदेशक डॉ. रमेशचंद मिश्र ने बताया कि नागा बाबा ठाकुरजी को विधर्मियों से बचाते हुए गूदड़ी में छिपाकर भरतपुर ले आए थे। उस समय भरतपुर का किला नहीं बसा था। यह यमुना जी का कैचमेंट एरिया था। इसलिए वे टीले पर झोपड़ी डालकर रहने लगे। बाद में कमरे का निर्माण हुआ और राधाजी की प्रतिमा भी विराजमान की गई। इसलिए प्राचीन मंदिर का स्वरूप हवेली शैली का था।

हालांकि बाद में भरतपुर के राजाओं ने बरामदे और कलात्मक गेट का निर्माण कराया। उल्लेखनीय है कि बिहारी जी का नागर शैली में बन रहा मंदिर संभवत: नवंबर तक पूरा होगा। गर्भग्रह और शिखर का निर्माण चल रहा है। रंग और नृत्य मंडप बन चुके हैं।

आज पहली बार बंद रहेगा बिहारीजी मंदिर

करीब 250 साल के इतिहास में पहली बार कोरोना संक्रमण के कारण श्रद्धालु बिहारीजी मंदिर में जन्मोत्सव कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाएंगे। महंत मनोज भारद्वाज ने बताया कि कोरोना संक्रमण के कारण सूक्ष्म रूप से पूजन-अर्चन-अभिषेक कार्यक्रम होगा। बुधवार को सुबह 7 बजे पंचामृत से अभिषेक होगा तथा नई पोषाक धारण कराई जाएगी। इसके अलावा रात्रि 11.15 बजे से जन्मोत्सव और अभिषेक कार्यक्रम होगा। इस कार्यक्रम में श्रद्धालुओं को प्रवेश नहीं मिलेगा।

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