भरतपुर में बनती है 14 तरह की गजक:विदेशों में भी छाया है कुटैमा गजक का स्वाद, दांत में फंसे तिल की वजह से 56 साल पहले फार्मूला हुआ इजाद

भरतपुर4 दिन पहलेलेखक: प्रमोद कल्याण
  • कॉपी लिंक
भरतपुर की कुटैमा गजक का स्वाद और सुगंध देश-प्रदेश के अलावा विदेशों तक मशहूर है। - Dainik Bhaskar
भरतपुर की कुटैमा गजक का स्वाद और सुगंध देश-प्रदेश के अलावा विदेशों तक मशहूर है।

भरतपुर की कुटैमा गजक का स्वाद और सुगंध देश-प्रदेश के अलावा विदेशों तक मशहूर है। इसका फॉर्मूला इजाद होने की कहानी बेहद रोचक है। दरअसल, करीब 56 साल पहले यहां आनंदस्वरूप गुड़ और तिल की सामान्य गजक बेचते थे। सन् 1965 में एक ग्राहक ने शिकायत थी कि तिल उनकी दाड (दांतों) में अटक गए हैं। मजा नहीं आया। आनंद स्वरूप काे यहीं से आइडिया आया कि क्याें न ऐसी गजक तैयार की जाए जिसमें तिल साबुत ही नहीं रहे। इसलिए उन्हाेंने कुटैमा गजक तैयार की। इसमें 35 ग्राम वजनी गुड़-तिल की लाेई काे लकड़ी के हथाैड़े से औसतन 40 बार कूटा जाता है।

एक बार में गजक टिकिया पर करीब 20 पाेंड का फाेर्स दिया जाता है। यानि करीब 800 पाेंड के फाेर्स (दबाव) से गुड में मिली करीब 2 हजार तिलें बारीक हाेकर मिक्स हाे जाती हैं। इससे गजक कुरकुरी बन जाती है। यही स्वाद भरतपुर की कुटैमा गजक काे अन्य जगहों की गजक से अलग करता है। निर्माता मुकेश कुमार बताते हैं कि भरतपुर की गजक जयपुर/दिल्ली मंडी के जरिए इंग्लेंड, ऑस्ट्रेलिया, सउदी अरब, पाकिस्तान, कनाड़ा, अमेरिका तक जा रही है। यूं तो उत्तर भारत के लगभग सभी शहराें में गजक मशहूर है।

लेकिन, मुरैना, आगरा, मेरठ, लखनऊ, पाली, राेहतक, दिल्ली, बीकानेर, भाेपाल, भरतरपुर और अलीगढ़ का अपना अलग स्वाद और पहचान है। कॉमन बात यह है कि ये सर्दियों में ही खासकर लोहड़ी और मकर संक्रांति पर ज्यादा बिकती है। क्योंकि इस त्यौहार का महत्व ही पतंग, गजक, रेवड़ी से है। गजक निर्माता वेलफेयर साेसायटी के उपाध्यक्ष उदयसिंह के मुताबिक देशभर में करीब दाे लाख से ज्यादा काराेबारी इससे जुडे़ हैं। सीजन में करीब 800 कराेड़ रुपए का काराेबार हाेता है। दीपावली से हाेली तक सर्दी के सीजन में करीब 12 कराेड़ रुपए का काराेबार अकेले भरतपुर शहर में हाेता है।

इंग्लेंड, ऑस्ट्रेलिया, सउदी अरब, पाकिस्तान, कनाड़ा और अमेरिका में भी है डिमांड

बाजार में उपलब्ध है 14 तरह की गजक, सुपर शाही की कीमत इसमें सबसे ज्यादा
गजक को लेकर भरतपुर में लगातार प्रयाेग हाे रहे हैं। यहां 14 प्रकार की गजक तैयार हाेती हैं। इसमें सबसे महंगी सुपर शाही गजक है। जिसमें गुड का बेस थाेड़ा रखते हैं। मिठास के लिए विशेष रूप से प्राेसेस शहद इस्तेमाल हाेता है। तिल से ज्यादा बादाम, पिस्ता, केसर मिला कर कूटा जाता है। मुख्य रूप से कुटैमा गजक बिकती है। इसके अलावा शाही गजक, अलसी, शुगर फ्री, चीनी, मूंगफली, ड्रायफ्रूट, केसरबाटी, तिल-मूंगफली, राेल, बिस्कुट, पट्टी, लइया गजक आदि तैयार हाेती हैं। मेरठ और मुजफ्फर नगर के कारखानाें से गुड़ आता है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से ... मेटाबाॅलिज्म के साथ हीमोग्लोबिन और इम्युनिटी पॉवर भी बढ़ती है
डायटिशियन डॉ. स्वाति व्यास बताती हैं कि तिल और गुड़ सर्दी में ही खाने चाहिए। यह मेटाबाॅलिज्म बढ़ाता है। एंटी ऑक्सीडेंट, विटामिन्स, मिनरल, कैल्शियम, आयरन, जिंक, सेलेनियम का अच्छा स्त्राेत है। इससे हीमाेग्लाेबिन और इम्युनिटी पावर बढ़ती है। त्वचा की ताजगी के लिए भी अच्छा है।

खबरें और भी हैं...