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कोरोना अपडेट:11000 पार हुए कुल संक्रमित रोगी; 24 घंटे में 147 नए केस, अब 1304 एक्टिव केस

भरतपुर2 दिन पहले
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प्रतीकात्मक फोटो। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो।

देश में संभवतः यह सबसे अनूठा मामला है। करीब 8 महीने यानि कोरोना से अब तक की सबसे लंबी जंग सविता (बदला हुआ नाम) हार गई। वह काफी समय से भरतपुर के अपनाघर आश्रम में भर्ती थी। उसका आश्रम की ओर से सोमवार को कोविड प्रोटोकॉल के मुताबिक अंतिम संस्कार किया गया।

इधर, जिले में कुल संक्रमितों का आंकड़ा 11000 को पार कर गया है। अब तक 11716 लोग पॉजिटिव हुए हैं। इनमें 147 रोगी तो पिछले 24 घंटे में ही मिले हैं। जबकि कोरोना से एक और मौत हो गई। हालांकि राहत की बात यह है कि 10,000 से ज्यादा रोगी ठीक भी हुए हैं। जिले में अब 1304 एक्टिव केस हैं।

इधर, अपनाघर के संस्थापक अध्यक्ष डाॅ. बीएम भारद्वाज ने बताया कि 30 वर्षीय सविता कोरोना पॉजिटिव के साथ-साथ मानसिक विमंदित और एचआईवी पॉजिटिव भी थीं। वह पिछले साल 24 अगस्त को आश्रम में भर्ती हुई थीं। चूंकि उस समय कोरोना की पहली लहर थी। इसलिए उनका टेस्ट कराया गया। जिसमें 28 अगस्त को वह पॉजिटिव आ गई थी।

डाॅ. बीएम भारद्वाज ने बताया कि विशेषज्ञों के मुताबिक पेशेंट के म्यूकोजा (नाक की झिल्ली) में डैड वायरस स्टोर होने से यह काफी कमजोर हो गई थी। इससे उनके टेस्ट पॉजिटिव आ रहे थे। और दूसरा ये कि उनकी इम्युनिटी जीरो थी। जिससे संक्रमण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। वे आश्रम की पहली कोरोना पॉजिटिव महिला भी थीं।

43 जांच रिपोर्ट आईं पॉजिटिव, 8 किलो बढ़ गया था वजन

अब तक उनकी 43 आरटीपीसीआर और रेपिड एंटीजन टेस्ट हा़े चुके थे। उन्हें ठीक करने के लिए तमाम प्रयास किए गए। लेकिन, आमतौर पर कोरोना वायरस का संक्रमण 14 दिन में खत्म हो जाता है। लेकिन, सविता ने करीब 8 महीने दो कमरों में कैद रहकर कोरोना से संघर्ष किया था। इस दौरान उन्हें एलोपैथी, होम्योपैथी और आयुर्वेदिक दवाइयां भी दी गईं।

करीब 46 लीटर आयुर्वेदिक काढ़ा और 250 ग्राम से ज्यादा दवाएं खा चुकी थीं। फिर भी कोरोना ने उनकी जिंदगी नहीं बक्शी। हैरत की बात यह है कि इस दौरान वह स्वस्थ महसूस करते हुए अपने सारे काम खुद ही करती थीं। उनका वजन भी इस दौरान 8 किलो बढ़ गया था।

डॉक्टरों के लिए भी अजूबा था सविता का मामला
माइक्रोबायोलॉजिस्ट विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप कुमार का कहना था कि ‘कोरोना पॉजिटिव होने के बावजूद सविता दूसरों के लिए खतरा नहीं थी। उनकी शरीर में मौजूद वायरस एक्टिव नहीं होने के कारण उनसे दूसरों में संक्रमण नहीं फैल सकता था। फिर भी एहतियात के तौर पर उन्हें आइसोलेशन में रखा गया।

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