पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

कोरोना इफ़ेक्ट:घर बैठे बच्चे हो रहे चिड़चिड़े, ना स्कूल भेज सकते हैं और न ही बाहर, डाक्टर बोले उन्हें अकेला नहीं छोड़ें उनके साथ गेम्स खेलें

चित्तौड़गढ़एक महीने पहले
  • कॉपी लिंक
डैमाे पिक। - Dainik Bhaskar
डैमाे पिक।

कोरोना वायरस के प्रकोप व लॉकडाउन के कारण बड़ों के साथ बच्चे भी घर पर रह रहे हैं। ना उनका स्कूल जाना हो रहा है और ना ही आउट डोर गेम्स। ऐसे में घरों में बंद बच्चे चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। अभिभावकों को भी इस बात से परेशानी हो रही है। कई माताओं का कहना है कि ऑनलाइन के जरिये ही डॉक्टर को कंसल्ट कर रहे हैं और उनकी काउंसलिंग भी करवा रहे हैं।

लॉकडाउन में बच्चे लगभग एक साल से घर पर बंद हैं। बाहर की चीजें खाने के साथ आउटडोर गेम खेलने व कहीं जाने की छूट नहीं है। साथ ही उन्हें हमउम्र का साथ भी नहीं मिल पा रहा है। मेंटली वे समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर हुआ क्या है और कब तक ऐसी स्थिति रहेगी।

ऐसे में बच्चो में खाना फेंक देना, किताबें फाड़ना, खिलौने तोड़ना, रात में नहीं सोना और बाहर जाने की जिद करने जैसी समस्याएं आ रही हैं। इधर माताओं का कहना है कि कोविड की तीसरी लहर में संभावित रूप से बच्चों पर असर पड़ने की खबर से ही डर लगता है।

ऐसे में बच्चों को कैसे बाहर जाने दिया जाए। वहीं ऑनलाइन क्लासेस के कारण लगातार मोबाइल में देखते रहना पड़ता है। अगर इसके अलावा बच्चे वीडियो गेम्स की मांग करते हैं तो वह इच्छा भी पूरी नहीं कर पाते हैं। लगातार इस तरह से मोबाइल का इस्तेमाल करने से उनकी आंखों पर भी बुरा असर पड़ेगा।

शिशु विशेषज्ञ का कहना लॉकडाउन में माता-पिता ही उबार सकते है बच्चों को तनाव से

अभिभावकों का कहना है कि लगातार घर में रहने से और ऑनलाइन पढ़ाई के लोड से बच्चों में मानसिक तनाव बढ़ रहा है। जिसके बाद ऑनलाइन ही डॉक्टर को कंसल्ट करना पड़ रहा है या फिर काउंसलिंग की जरूरत पड़ रही है।

वहीं शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जय सिंह मीणा का कहना है कि लॉकडाउन में माता-पिता ही बच्चों को तनाव से उबार सकते हैं। वे बच्चों की मानसिक स्थिति को समझे। सबसे पहले बच्चों की पसंद जानने की कोशिश करें। उनके साथ समय व्यतीत करें। उनके साथ खाते वक्त डाइनिंग टेबल पर तब तक बैठे रहें जब तक वे खाना खा रहे हैं।

वॉल पेंटिंग करने व कमरे को सजाने के लिए बच्चों को प्रोत्साहित करें। बच्चों की बुरी आदतों को देखें तो उसे प्यार से समझाएं। गुस्सा करने से बच्चा डिप्रेशन, मूड डिजऑर्डर का शिकार हो सकता है। ज्यादातर पिता बच्चों के साथ कैरम, लूडो, बॉल खेलकर समय बीताएं। बच्चों के पसंद के प्रोग्राम चलाकर उसके साथ देखें। उसे कमरे तक ले जाकर सुलाएं। इस तरह बच्चे चिड़चिड़े नहीं होंगे और परिवार से भी जुड़ सकेंगे। क्योंकि यह अगर लंबे समय तक यह चिड़चिड़ापन रहा तो निश्चित ही यह बीमारी में भी बदल सकता है।

खबरें और भी हैं...