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  • For The First Time In Bhaskar, The 1400 year old Original Idol Of Mewar's Kuldevi Banmata Was Seen, The Invaders Broke The Original Form Established Behind, And Put A New Statue Ahead So That The Fragmented Form Is Not Visible.

आज से नवरात्र:पहली बार भास्कर में मेवाड़ की कुलदेवी बाणमाता की 1400 साल पुरानी मूल मूर्ति के दर्शन, पीछे स्थापित मूल स्वरूप को आक्रांताओं ने तोड़ दिया आगे नई प्रतिमा लगाई ताकि खंडित रूप नजर नहीं आए

चित्तौड़गढ़20 दिन पहले
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  • पहली मूर्ति बप्पारावल ने 7वीं शताब्दी में और दूसरी मूर्ति महाराणा सज्जनसिंह ने 18वीं सदी के अंत में लगवाई

नवरात्र के पहले दिन आज भास्कर पाठकों को चित्तौड़ दुर्ग स्थित मेवाड़ की कुलदेवी बाणमाताजी के उस मूल स्वरुप के दर्शन करवा रहा है, जो भक्तों को मंदिर में नहीं होते हैं। पुजारी मुकेश पालीवाल ने यह दुर्लभ तस्वीर उपलब्ध कराई है। ये सफेद संगमरमर में ऊपर-नीचे एक ही मूर्ति के दो चेहरे नहीं बल्कि दो अलग-अलग मूर्तियां हैं। ऊपर वाली 7वीं शताब्दी में बप्पा रावल द्वारा स्थापित बाणमाता की मूल मूर्ति है। सदियों बाद उसके आगे उसी तरह बनवाई गई दूसरी मूर्ति स्थापित की गई। तब से भक्तों को बाद में लगाई नई प्रतिमा के ही दर्शन होते हैं। पहली मूर्ति के भारी भरकम शृंगार के कारण पिछली मूलस्वरूप वाली मूर्ति का सिर्फ थोड़ा सिर खुला रहता है लेकिन उसका एकाएक किसी को पता नहीं चलता।

गुजरात से लाए थे बप्पा...चित्तौड़ फतह के बाद बप्पा रावल सूरत गए थे। वहां बाण के राजा की बहन इस्फगुल से विवाह किया। वे देबंदर से बाणमाता की मूर्ति भी लाए। इस प्रतिमा के चार हाथ हैं। दांये हाथों में अंकुश एवं बाण और बायें हाथों में पाश एवं धनुष है। दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय के प्रथम श्लोक में इनका जिक्र है।

यह हंसवाहिनी हैं। सातवीं शताब्दी में बप्पा रावल द्वारा मान मौर्य से मेवाड़ हासिल करने के बाद इस मंदिर में बाणमाता की मूर्ति स्थापित की गई थी। 15वीं शताब्दी में बाहरी आक्रांताओं के हमले में यह मूर्ति खंडित हो गई थी। 18वीं शताब्दी के अंत में मेवाड़ महाराणा सज्जन सिंह ने जीर्णोद्घार कर बाणमाता की संगमरमर की हूबहू प्रतिमा पुरानी मूर्ति के आगे स्थापित कराई ताकि खंडित स्वरूप नजर नहीं आए।

काले पत्थर के सभा मंडप पर 9 देवी प्रतिमाएं... प्राचीन मूर्ति के पीछे काले पत्थर के सभा मंडप में नौ देवी प्रतिमाएं हैं जो इसे नवदुर्गा स्वरूप भी देता है। इनमें 4-4 मूर्तियां दाई-बाईं साइड में और एक ऊपर विराजमान है। वर्तमान शृंगार में इन नवदुर्गा स्वरूप के भी दर्शन नहीं होते हैं। दोनों प्रतिमाएं सफेद मार्बल की हैं। लगभग एक जैसे आकार व मुद्रा में बनवाई गई। ऐसे सुंदर मुखारविंद वाले विग्रह बहुत कम मिलते है। मंदिर का निर्माण उत्तर भारतीय नागर शैली में हुआ।

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