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इंजीनियर डे पर खास:गुड़ के पानी, उड़द के आटे; केलू और बारीक चूने के लेप से पत्थरों को जाेड़कर बनाया था

चित्तौड़गढ़5 दिन पहले
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  • जानिए 13वीं सदी के विजय स्तंभ की इंजीनियरिंग
  • यहां की चट्टानें बहुत मजबूत हैं जो सेंड स्टोन मिक्स

सेंड स्टोन मिक्स पत्थर चित्तौड़ किले के ही हैं
निर्माण में लगे पत्थर चित्तौड़ किले के ही होने चाहिए। यहां की चट्टानें बहुत मजबूत हैं जो सेंड स्टोन मिक्स है। राजा महाराजा हर निर्माण के लिए इन्हीं की खुदाई कराकर पत्थर निकलवाते और उस जगह जलाशयों का निर्माण भी करवाते थे।

क्वालिटी ऐसी कि धूल, धूप व पानी का असर नहीं होता

दुर्ग की पहाड़ी पर चट्टानों से निकले इन पत्थरों पर मौसम का प्रभाव बहुत कम होता है। बरसों या सदियों तक भी मौसम के कारण कमजोर नहीं होते। पत्थर के ज्वाॅइंट ब्रेक करके लगाते थे। अब तक मजबूती व अस्तित्व का कारण भी यही है।

पत्थर वज्र लेप से चिपकाए थे, अब ऐसा नहीं बनता है

नींव से लेकर ऊपर तक एक के ऊपर एक पत्थर जोड़ने के लिए कारीगर गुड़ का पानी, उड़द का आटा, केलू और चूने का बारीक चूरा जैसे कई पदार्थ मिक्स कर मसाला तैयार करते थे। यह इन्होंने खुद इजाद किया। बहुत साल पहले फतहप्रकाश महल में एक दीवार पंक्चर करने में पसीने छूट गए। विजयस्तंभ, कीर्तिस्तंभ व समिद्धेश्वर महादेव मंदिर के कारण दुर्ग वर्ल्ड इंजीनियरिंग के लिए भी शोध का विषय है।

डमरू शेप में है स्तंभ

  • 30 फीट चौड़ा डमरू शेप का है यह टावर। यानी नीचे और ऊपर की दो-दो मंजिला चौड़ी, बीच की सकरी।
  • 47 फीट वर्गाकार व 10 फीट ऊंचे आधार पर बना 9 मंजिला स्तंभ।
  • 157 सीढ़ियां हैं अंदर से ऊपर जाने के लिए।
  • 08 साल लगे निर्माण में महाराणा कुंभा के काल में निर्माण हुआ। 1440 में शुरू होकर 1448 में पूरा हुआ।
  • कारीगरी: तब यही निर्माण शैली थी, लेकिन इतनी ऊंचाई तक पत्थर पहुंचाना चमत्कारिक है।

विजयस्तंभ की इंजीनियरिंग को समझने के लिए दैनिक भास्कर ने शहर के सीनियर सिविल इंजीनियर पीडब्लूडी के पूर्व अभियंता केएम जैन से बात की। उन्होंने इस पर विशेष शोध करने वाले रिटायर एक्सईएन कोठारी सहित अन्य वास्तुविदों की स्टडी देखकर विजय स्तंभ की इंजीनियरिंग के बारे में भास्कर संवाददाता को बताया।

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