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विपरीत मौसम में भी नारंगी की बहार:चित्तौड़ के किसानों को रास आ रही है नागपुरी संतरे की खेती, हाईटेक तरीके से दे रहे फसलों को रूप, रिटर्न अच्छा मिला तो कई किसान जुड़े इस खेती से

चित्तौड़गढ़4 महीने पहले
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संतरे के बाग। - Dainik Bhaskar
संतरे के बाग।

इन दिनों किसान कई प्रयोग कर रहे हैं और अन्य क्लाइमेट की फसलों को भी महत्व दे रहे हैं। ऐसे ही निंबाहेड़ा उपखंड के मरजीवी गांव में एक व्यक्ति ने अपनी इंजीनियरिंग खत्म करने के बाद अपने खेत पर कुछ नया करने की कोशिश की। किसान ने नागपुर से संतरे के 1300 पौधे मंगवा कर 13 बीघा जमीन पर हाईटेक तरीके से लगाए। पांच सालों में पौधे बड़े होकर अच्छा रिटर्न देने लगे तो आसपास के क्षेत्रवासियों भी अपनी जमीनों पर संतरे की पैदावार करने लगे। देखते ही देखते मरजीवी में आज लगभग 100 बीघा जमीन पर किसानों द्वारा संतरे की खेती की जाती है और एक छोटे से गांव से अब यह संतरे जयपुर, अजमेर, दिल्ली तक भेजे जा रहे हैं।

मरजीवी निवासी विक्रम पुत्र कालू लाल आंजना ने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई खत्म करने के बाद कुछ नया करने का सोचा। उसके पड़ोस में अन्य राज्यों से उनके रिश्तेदार आते-जाते थे। इसी बीच उन्हें परिजनों से नागपुरी संतरे की हाइब्रिड खेती करने का आइडिया मिला। राजस्थान में संतरे के प्रति अनुकूल क्लाइमेट नहीं है इसलिए हाईटेक तरीके से खेती करने की सोची।

1300 पौधों से की थी शुरुआत, पांच सालों में क्षेत्र के अन्य किसानों के जुड़ने से 100 बीघा जमीन पर की जा रही है खेती

विक्रम आंजना ने बताया कि शुरू में नागपुर से संतरे के 1300 पौधे मंगवाए गए और लगभग 13 बीघा जमीन पर यह पौधे लगाए गए। संतरे के पौधे पांच साल बाद फल देने लगते हैं। 4 साल तक इनकी बहुत बारीकी से देखभाल करनी पड़ती है। हालांकि इन 5 सालों में भी उन्होंने आसपास अन्य खेती भी की है।

आंजना का मानना है कि संतरे की खेती से रिटर्न अच्छा होता है। इसको देखकर ही एक प्रयास किया गया था। 2012 में इसकी शुरुआत की फिर तो 2017 में जब पहली बार इसमें अच्छे फल आए तो 12 बीघा जमीन को और डवलप किया गया। यह देखकर धीरे-धीरे आसपास के किसान भी इससे जुड़ने लगे और अपनी जमीनों पर संतरे की खेती करने लगे। देखते ही देखते आसपास के लगभग 100 बीघा जमीन में अब खेती की जा रही है।

पेड़ों पर लगे संतरे।
पेड़ों पर लगे संतरे।

दो सालों से कर रहे हैं मौसंबी की भी खेती

विक्रम आंजना ने बताया कि संतरे सर्दी और गर्मी दोनों ही मौसम में फल देते हैं लेकिन अनुपात के हिसाब से। कभी सर्दी में ज्यादा फल आते हैं तो गर्मी में कम, कभी गर्मी में ज्यादा फल आते तो सर्दी में कम। अब तो 2019 में 13 बीघा पर मौसंबी के पेड़ भी लगाए गए हैं।

परेशानियां भी आईं

पौधे नागपुर लेने गए थे, वहां पिकअप गाड़ी में लाए। सबकुछ इतना आसान भी नहीं था। फसल के दौरान कई परेशानियों का सामना करना पड़ा। पहली बार खेती की जा रही थी इसलिए जानकारी भी नहीं थी कि नई फसल के दौरान उसमें फल मक्खी लगती है, जो फल का सारा रस लेकर उसे पंचर करती है, जिससे फल सूख कर गिर जाता है। इसके अलावा नीमा टोट रोग की भी शिकायत मिल रही थी, जिससे पौधों की ग्रोथ भी रुक रही थी।

विक्रम ने बताया कि मुझे पेड़ पौधों से खास लगाव है इसीलिए मैं पौधों के आसपास घूम-घूम कर देखता रहता था। उससे मुझे इस बात की जानकारी हुई। उसके बाद बीज भंडार वालों से बातचीत की और पेस्टीसाइड के अलावा जो भी कीटनाशक की जरूरत थी, वह लेकर आए और उससे पौधों के अलावा जड़ों में भी स्प्रे किया गया।

उसके कुछ दिन बाद थ्रिप्स की भी प्रॉब्लम हुई। थ्रिप्स एक ऐसा रोग है जो पौधा और फल दोनों में लगते हैं। पौधे में लगते हैं तो पौधों की ग्रोथ रुक जाती है और फलों में लगने से फल सिकुड़ जाते हैं। फिर धीरे-धीरे इन का निवारण किया। आंजना का कहना है कि दो-तीन साल तक तो हमें यह तक नहीं पता था कि इन की कटिंग कैसे की जानी है। सूखी टहनियां हटानी पड़ती हैं। बाद में ये सारे काम धीरे-धीरे शुरू किए। 5 साल बाद जब पहली बार पेड़ों में फल लगे तो काफी फल गिर कर खराब हो गए। उसके बाद सभी उपाय किए गए।

लेकिन परिवार का सहयोग मिला

विक्रम आंजना ने जब पहली बार अपना आइडिया बताया तो परिवार के सभी जनों ने खुशी-खुशी इसमें सहयोग किया। आज इतने बड़े बाग को विक्रम आंजना के अलावा उनका छोटा भाई देवी सिंह, दोनों अंकल जीवनलाल, रामलाल और पापा कालू लाल भी संभालते हैं, लेकिन मैनेजमेंट का सारा काम विक्रम आंजना ही संभालते हैं।

एक बीघा में 70 से 90 हजार तक मिलता है प्रॉफिट

अंजना ने बताया कि एक बीघा में लगभग 10 से 12000 का खर्चा होता है जबकि रिटर्न 80 हजार से 1 लाख के बीच होता है। इस तरह प्रॉफिट एक बीघा का 70 से 90 हजार के बीच में हो जाता है। लेकिन यह पूरी तरह से मार्केट वैल्यू पर डिपेंड होता है।

पिछले साल कोविड काल में 50 हजार रुपए के संतरे जरूरतमंदों को ही दे दिए, क्योंकि कोविड-19 समय विटामिन सी की बहुत जरूरत होती है। इसलिए जो भी जरूरतमंद थे और उन्हें जरूरत थी हमने उन्हें ऐसे ही दे दिया। आंजना का कहना है कि जयपुर, अजमेर, दिल्ली में भी हम सप्लाई करते हैं। इस साल साउथ में भी सप्लाई करने का था लेकिन कोविड की वजह से अटक गया।

फल तोड़ने के बाद उन्हें घर के गोदाम में रखते हैं और ब्रोकर के जरिए अन्य जिलों या राज्यों में पहुंचाया जाता है। उनके ब्रोकर द्वारा ट्रक भेजा जाता है और तीन क्वालिटी वाइज फलों को बांटा जाता है। पहला सुपीरियर, दूसरा एवरेज और तीसरा लोअर। उस हिसाब से कैरेट बनाकर यह लेकर जाते हैं और रिजेक्टेड को यहीं छोड़ दिया जाता है। हालांकि रिजेक्टेड माल बहुत ही कम निकलता है।

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