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चित्तौड़ दुर्ग बंद, संकट में पर्यटन उद्योग:पर्यटकों से 12 महीने गुलजार रहने वाली विश्व विरासत में खामोशी, व्यापारी बोले- इतने बुरे हालात पहले कभी नहीं हुए; परिवार पालना हो गया मुश्किल

चित्तौड़गढ़एक महीने पहले
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दुर्ग में पर्यटकों के नहीं आने से वीरान हुआ स्मारक। - Dainik Bhaskar
दुर्ग में पर्यटकों के नहीं आने से वीरान हुआ स्मारक।

विश्व विरासत में शुमार चित्तौड़ दुर्ग वीरानी की मार झेल रहा है। 12 महीने पर्यटकों से गुलजार रहने वाले इस ऐतिहासिक जमीन पर सन्नाटा है। कोरोना की दूसरी लहर ने पूरी तस्वीर बदलकर रख दी है। पिछले साल भी यही हाल हुआ था। फिर भी जुलाई-2020 में दुर्ग खोलने की अनुमति मिली तो दुर्ग के पुराने दिन लौट आए थे। अब फिर से महामारी के कारण आवाजाही पर पाबंदी लगा दी गई है। इसका सीधा असर यहां के पर्यटन उद्योग पर पड़ा है। कारोबारी टूट चुके हैं। राजस्थानी ड्रेस व्यापारी लक्ष्मण माली का कहना है कि सीजन टाइम में लगभग 1000 से 1500 रुपये प्रतिदिन मिल जाया करते थे। इस बार सबकुछ खत्म है।। 30 सालों से यहीं पर व्यवसाय किया जा रहा है, लेकिन पहली बार हालत इतने बदतर हो गए। ड्रेस वाला, गाइड, फोटोग्राफर, घोड़े वाला, ऊंट सवारी, चाय वाला, रेस्टोरेंट, ऑटो चालकों जैसे दर्जनों व्यापारियों पर बुरा असर पड़ा है। दुर्ग पर लगभग 2700 की आबादी है और इनमें से करीब 80 प्रतिशत लोग केवल पर्यटन पर निर्भर हैं।

दुर्ग के भीत बने म्यूजियम पर लटका ताला।
दुर्ग के भीत बने म्यूजियम पर लटका ताला।

देसी पर्यटकों के आना का है सीजन

मार्च, अप्रैल, मई, जून, जुलाई में चित्तौडग़ढ़ दुर्ग के लिए देसी पर्यटकों का सीजन रहता है। यहां पर गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं पश्चिम बंगाल से हजारों की संख्या में पर्यटक पहुंचते थे। इस बार यहां पयर्टन सीजन के समय में भी वीरानी छा गई है।

प्रसादी का आयोजन

मई, जून माह में शादी का सीजन होता है। इस दौरान लोग कालिका माता के दर्शन करने भी आते थे। शादी के बाद पहली बार यही धोक लगाया जाता है। यहां पर प्रसादी का भी आयोजन किया जाता है, जिसके कारण 10-15 हजार लोग प्रतिदिन आते हैं। इसके कारण कई परिवारों की इनकम अच्छी हो जाती थी।

कालिका माता मंदिर भी बंद है।
कालिका माता मंदिर भी बंद है।

कोई विकल्प भी नहीं

गाइड राजू माली का कहना है की दुर्ग बंद होने से इनकम बिल्कुल ही खत्म हो गई है। वैसे भी सब लोग गाइड लेना इतना पसंद भी नहीं करते, अपने हिसाब से घूमना पसंद करते हैं। अन्य राज्यों से आने वाले लोगों को गाइड चाहिए होता है।

तब की बात अलग थी
फोटोग्राफर संजय शर्मा ने कहते हैं- पिछली बार लॉकडाउन के समय भी हमने सरकार से मांग की थी कि हमारी पूरी आजीविका दुर्ग पर पर्यटकों के आने से चलती है। अगर पर्यटक नहीं आ पाते हैं तो हमारे लिए कुछ सरकार को करना चाहिए ताकि हम अपने परिवार को खाना खिला सकें। इसके लिए फोटोग्राफर एसोसिएशन ने ज्ञापन भी सौंपा। लेकिन उसका कोई भी परिणाम नहीं निकला। हम सब घर पर ही बैठे हैं।

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