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विदेशों में भी बढ़ रही है आकोला प्रिंट की मांग:इंडिगो कलर से बने डाबु प्रिंट बनी आकोला की पहचान, सिर्फ नेचुरल कलर से ही किया जाता है डाई, उद्योग विभाग ने GI रजिस्ट्रेशन के लिए भेजा प्रपोजल

चित्तौड़गढ़2 महीने पहले
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साड़ी पर लगाया जा रहा ब्लॉक प्रिंट। - Dainik Bhaskar
साड़ी पर लगाया जा रहा ब्लॉक प्रिंट।

जिले के आकोला क्षेत्र ने देश में अपनी अलग पहचान बनाई है। यहां के ब्लॉक प्रिंट और इंडिगो डाबु प्रिंट ने देश में अपनी जगह बना ली है। हालांकि राजस्थान के कई क्षेत्रों में डाबु प्रिंट का कार्य होता है लेकिन आकोला ही एक ऐसा क्षेत्र है जहां डार्क इंडिगो कलर कपड़ों पर चढ़ता है। इसके अलावा आकोला ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां प्रिंट का काम सिर्फ नेचुरल कलर से किया जाता है।

यहां तक कि अब इसको अंतरराष्ट्रीय तौर पर पहचान मिल चुकी है। 2015 में यहां के एक कारीगर को पीएम नरेंद्र मोदी से राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका है। अब उद्योग विभाग इस यूनिक काम को और उसी स्तर पर ले जाने के लिए GI (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) से जोड़ने के लिए चेन्नई प्रपोजल भेज दिया है ताकि इनकी कार्यशैली को कोई और चोरी ना कर सके।

जिले की भूपालसागर तहसील का आकोला कस्बा उदयपुर और चित्तौड़ शहर के बीचों बीच स्थित है। दोनों तरफ़ से यह करीब 65 किलोमीटर दूर है। यहां छीपा जाती के लोग बसे हुए हैं और उनके द्वारा पारंपरिक रूप से टाई एंड डाई का कार्य किया जाता है। इसलिए आकोला को छीपों का आकोला बोला जाता है। यहां के कारीगर वेजिटेबल, फ्रूट्स और प्लांट से कलर बनाते हैं।

डाबू के जरिए डिजाइन बनाया जा रहा है।
डाबू के जरिए डिजाइन बनाया जा रहा है।

नदी के पानी में ही है रसायन, जिससे कपड़ों को मिलता है गहरा कलर

नेशनल अवार्ड विनर कारीगर सुरेश छीपा ने बताया कि पहले यहां केवल फेटिया और दुपट्टा बनाया जाता था। अलग-अलग कास्ट के लिए अलग-अलग फेटिया और दुपट्टा बनाया जाता था ताकि हर कास्ट की पहचान हो सके, लेकिन जब से स्क्रीन प्रिंट का चलन आया तो यह काफी पीछे रह गया। फिर राज्य सरकार की कलस्टर परियोजना से इसे पुनर्जीवित किया गया।

इसे मॉडर्न तरीके से बना कर विदेशों तक भी माल पहुंचाया गया। इसके अलावा डिजिटल इंडिया से भी काफी फायदा मिला है। फेटिया में केवल लाल और काला रंग ही होता था, लेकिन उसमें उन्होंने इंडिगो कलर एड किया। नेचुरल डाई उदयपुर से मंगवाया जाता है। यहां के कपड़ों पर चढ़ा ब्लू कलर बहुत डार्क होता है, जबकि अन्य जगहों पर यह कलर डार्क नहीं होता। संयोगवश यहां की नदियों में कुछ ऐसे रासायनिक तत्व मौजूद हैं, जिससे रंग अधिक स्थाई एवं चटकीले हो जाते हैं।

टाई एंड डाई के बाद कपड़ों को सुखाया जाता है।
टाई एंड डाई के बाद कपड़ों को सुखाया जाता है।

ऐसे तैयार किया जाता है डाबु

कारीगर लक्ष्मी लाल छीपा ने बताया कि अकोला में मिट्टी को पहले रात में गलाया जाता है, फिर उसे चूने के साथ रौंदा जाता है। फिर अलग से गोंद का पानी तैयार कर उसे मिलाकर पैरों से 2 से 3 घंटा रौंदकर उसे दो से तीन बार छाना जाता है।

इस मिट्टी को साफ किया जाता है, इसे डाबु कहते हैं। इनके पास लकड़ियों के अलग-अलग डिजाइन के ब्लॉक होते हैं। कपड़े को 4 बाय 27 फीट के एक टेबल पर बिछाया जाता है और उसके बाद ब्लॉक लगाया जाता है। जहां कलर नहीं चाहिए वहां हाइड करने के लिए डाबु लगाया जाता है। इसलिए इसे डाबु प्रिंट कहते हैं। फिर टाई एंड डाई कर कपड़ा रेडी किया जाता है।

डाबू को तैयार करते हुए कारीगर।
डाबू को तैयार करते हुए कारीगर।

विदेशों तक भी मंगवाए जाते हैं अकोला प्रिंट के कपड़े

अब इस प्रिंट की इतनी मांग बढ़ चुकी है कि फैब इंडिया के साथ-सथ दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई जैसे बड़े शहरों में इसको एक्सपोर्ट किया जाता है। इसके अलावा किसी ना किसी के माध्यम से अमेरिका, जर्मन, जापान तक भी ऑर्डर पहुंचाए गए हैं।

सुरेश छीपा का कहना है कि जहां पहले इसकी मांग केवल छोटे-मोटे दुकानों तक ही हुआ करती थी। अब रिटेलर और बड़े बड़े शोरूम वाले भी इसकी मांग करते हैं। हालांकि कोरोना काल में आर्डर आना थोड़ा कम हुआ है लेकिन अभी भी बिजनेस की मांग है।

पहले जहां पूरा परिवार मिलाकर भी 70-80 हजार ही कमा पाता था, आज साल में 6 से 7 लाख रुपए की कमाई हो जाती है। सुरेश ने बताया कि कॉटन, सिल्क और जॉर्जेट के कपड़ों में यह सारा काम किया जाता है।

टाई एंड डाई करते हुए सुरेश छीपा।
टाई एंड डाई करते हुए सुरेश छीपा।

स्टेट गवर्नमेंट ने दिया था 25 बीघा की जमीन, बनाया कॉमन फैसिलिटी सेंटर

लक्ष्मी लाल छीपा का कहना है कि उदयपुर के महाराजा यहां आए थे और यहां से कुछ कारीगरों को अपने उदयपुर दरबार में भी बुलाया था। उनका काम देखकर रानी को जब काम पसंद आया तो उन्होंने खुश होकर इनके लिए चारभुजा जी का मंदिर भी बनवाया। इस कला को देखकर 2008 में भी स्टेट गवर्नमेंट ने 25 बीघा की जमीन पर एक कॉमन फैसिलिटी सेंटर बना कर दिया था जिसमें यह काम कर सकें। हालांकि यहां पर सबकी अपनी अपनी यूनिट है।

120 छीपा परिवारों में से मात्र 5-6 परिवार ही अपना खुद का यूनिट स्थापित करने में सफल हो पाये हैं जिसमें सुरेश हेण्डप्रिंट, बरगद हेण्डप्रिंट, अनिल हेण्डप्रिेट, गोविन्द हेण्डप्रिंट, शिवओम हेण्डप्रिंट एवं गोपाल हेण्डप्रिंट कुछ चयनित नाम हैं।

ज्योग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्रेशन के लिए भेजा है प्रपोजल

उद्योग विभाग के महाप्रबंधक राहुल देव ने बताया कि यह कला बहुत पुरानी है। यह काम पूरी तरह से हाथ से किया जाता है और इनका काम पूरी तरह यूनीक है। इसलिए इस काम को ज्योग्राफिकल इंडिकेशन से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

GI में रजिस्ट्रेशन होने के बाद इनको और पहचान मिलेगी। वर्ल्ड लेवल पर यह कार्य किया जाएगा और इसकी कॉपीराइट भी हो जाएगी। राहुल देव ने बताया कि इसका डॉक्यूमेंट बनाकर प्रपोजल भेज दिया गया है। रजिस्ट्रेशन चेन्नई से किया जाता है। अगर इसका GI रजिस्ट्रेशन हो जाता है तो यह जिले में पहला GI रजिस्टर्ड होगा।

2015 में पीएम मोदी से मिला था नेशनल अवार्ड।
2015 में पीएम मोदी से मिला था नेशनल अवार्ड।

अकोला का नाम अभी इको फ्रेंडली छपाई से जुड़ा हुआ है

आकोला टाई एंड डाई कामगार नेचुरल कलर से काम करते हैं। यही कारण है कि आकोला का नाम आज भी ईको फ्रेंडली छपाई से जुड़ा है। ये सभी रंग प्रकृति से प्राप्त होते हैं जैसे गुड़, अनार की छाल, सकुड़, केसुला, हरड़ा, हर सिंगार, गोंद, कोचा हल्दी, मजीठा, कत्था, रतनजोत, लोहे की जंग, मिट्टी, गोबर, मुल्तानी, खाखरे के पत्ते, छाबड़ी के पत्ते तथा गेरु आदि नेचुरल रंगों के साथ फिटकरी, सोड़ा, सास्टिक, एलिजर, इंडिगो तथा नेफ्थोल का प्रयोग भी किया जाता है। डाबू प्रिंट का काम जयपुर, बगरू, कालाडेरा, जयरामपुरा, जावदा, बाड़मेर, जोधपुर में भी किया जाता है, लेकिन वहां पर केमिकल कलर का इस्तेमाल किया जाता है।

2015 में मिला था राष्ट्रीय अवार्ड

हैंडलूम व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार द्वारा 2015 से आज के दिन नेशनल हैंडलूम डे के रूप में मनाने का फैसला किया गया था। इस दिन ऐसे कई कारीगरों को सम्मानित किया जाता है।

अकोला क्षेत्र से सुरेश छीपा को 2015 में चेन्नई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से सम्मानित किया गया था। इससे पहले सुरेश छीपा को 1993 में राज्य स्तरीय अवार्ड मिला और जिला स्तरीय अवार्ड 1990 में मिला। उनके बड़े भाई भैरूलाल को 1983-84 में राज्य स्तरीय अवार्ड मिल चुका है और 1984 में उनको जिला स्तरीय अवार्ड और 1990-93 में भी जिला स्तरीय अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है जबकि दोनों की माता राधा देवी को 2000 में राज्य स्तरीय बोर्ड से सम्मानित किया गया है। इसी तरह यही के लक्ष्मीलाल छीपा को भी 2019 में जिला स्तरीय अवार्ड दिया गया है।

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