मेवाड़ की कुलदेवी बाणमाता की मूल मूर्ति के दर्शन:पीछे स्थापित मूल स्वरूप को आक्रांताओं ने तोड़ दिया, आगे नई प्रतिमा लगाई ताकि खंडित रूप नजर नहीं आए

चित्तौड़गढ़19 दिन पहले
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पहली मूर्ति बप्पारावल ने 7वीं शताब्दी में और दूसरी मूर्ति महाराणा सज्जन सिंह ने 18वीं सदी के अंत में लगवाई। - Dainik Bhaskar
पहली मूर्ति बप्पारावल ने 7वीं शताब्दी में और दूसरी मूर्ति महाराणा सज्जन सिंह ने 18वीं सदी के अंत में लगवाई।

शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन भास्कर पाठकों को चित्तौड़ दुर्ग स्थित मेवाड़ की कुलदेवी बाणमाताजी के उस मूल स्वरूप के दर्शन करवा रहा है, जो भक्तों को मंदिर में नहीं होते हैं। पुजारी मुकेश पालीवाल ने यह दुर्लभ तस्वीर उपलब्ध कराई है। यह सफेद संगमरमर में ऊपर-नीचे एक ही मूर्ति के दो चेहरे नहीं, बल्कि दो अलग-अलग मूर्तियां हैं। ऊपर वाली 7वीं शताब्दी में बप्पा रावल द्वारा स्थापित बाणमाता की मूल मूर्ति है।

सदियों बाद उसके आगे उसी तरह की दूसरी मूर्ति स्थापित की गई, तब से भक्तों को नई प्रतिमा के ही दर्शन होते हैं। पहली मूर्ति के शृंगार के कारण पिछली मूलस्वरूप वाली मूर्ति का सिर्फ थोड़ा सिर खुला रहता है, लेकिन उसका एकाएक किसी को पता नहीं चलता।

गुजरात से लाए थे बप्पा...चित्तौड़ फतह के बाद बप्पा रावल सूरत गए थे। वहां बाण के राजा की बहन इस्फगुल से विवाह किया। वे देबंदर से बाणमाता की मूर्ति भी लाए। इस प्रतिमा के चार हाथ हैं। दांये हाथों में अंकुश एवं बाण और बायें हाथों में पाश एवं धनुष है। दुर्गा सप्तशती के आठवें अध्याय के प्रथम श्लोक में इनका जिक्र है। यह हंसवाहिनी हैं। सातवीं शताब्दी में बप्पा रावल द्वारा मान मौर्य से मेवाड़ हासिल करने के बाद इस मंदिर में बाणमाता की मूर्ति स्थापित की गई थी। 15वीं शताब्दी में बाहरी आक्रांताओं के हमले में यह मूर्ति खंडित हो गई थी। 18वीं शताब्दी के अंत में मेवाड़ महाराणा सज्जन सिंह ने जीर्णोद्घार कर बाणमाता की संगमरमर की हूबहू प्रतिमा पुरानी मूर्ति के आगे स्थापित कराई, ताकि खंडित स्वरूप नजर नहीं आए।

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