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24 सालों में दूसरी बार टूटी परंपरा:बंगाली समाज की महिलाओं ने नहीं खेला सिंदूर,गाइडलाइन देरी से आने पर कारीगर भी निराश लौटे

चित्तौड़गढ़एक महीने पहले
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विजयादशमी के दिन बंगाली समाज पूजा करते हुए। - Dainik Bhaskar
विजयादशमी के दिन बंगाली समाज पूजा करते हुए।

नवरात्रि के पंचमी से शुरू होने वाली बंगाली समाज की दुर्गा पूजा करने की परंपरा लगातार दो सालों से टूट रही है। आज विजयादशमी है। इस दिन बंगाली समाज मां दुर्गा को विदाई देने के लिए सिंदूर खेला का आयोजन करता है। शहर में 24 सालों से चली आ रही है यह अनोखी परम्परा दो सालों से टूट गई है।

रेलवे स्टेशन मार्ग पर आशीर्वाद वाटिका में बंगाली समिति हर साल पंचमी पर मूर्ति स्थापना कर दशमी के दिन सिंदूर खेला कार्यक्रम करती है। इस साल ना तो माता की मूर्ति स्थापित हो पाई और ना ही सिंदूर खेला होगा। समिति के अध्यक्ष अमित चक्रवर्ती का कहना है कि सरकार ने बहुत लेट गाइडलाइन जारी किया था। मूर्ति बनाने से लेकर सभी तरह की तैयारी पहले शुरू करनी पड़ती है। लास्ट समय में कोई भी तैयारियां करना मुश्किल होता है। उन्होंने बताया कि 25 अगस्त को ही मूर्तिकार कोलकाता से चित्तौड़गढ़ आ चुका थ, लेकिन उसे यहां से खाली हाथ लौटना पड़ा।

मां के गालों में पानों से वरण कर उन्हें विदाई देती हुई बंगाली महिलाएं। (फ़ाइल फ़ोटो)
मां के गालों में पानों से वरण कर उन्हें विदाई देती हुई बंगाली महिलाएं। (फ़ाइल फ़ोटो)

कुछ ही मूर्तियों के ऑर्डर पर सिमट कर रह गया

कारीगर गोविंदपुर, हावड़ा निवासी तरुण कुंडू का कहना है कि हर साल 10 दुर्गा की मूर्ति, 17 शेरावाली, 9 गणेश, 6 विश्वकर्मा की मूर्तियों के कई आर्डर मिल जाते थे। इस बार 1-2 मूर्तियों में ही आर्डर सिमट गया। अमूमन लोग 9 से 10 फुट की दुर्गा मां की मूर्ति पसंद किया करते। डिमांड पर ही काम करते हैं लेकिन अभी तक ऐसा कुछ नहीं होगा। 2020 में तो एक भी मूर्ति नहीं बनाई गई और खाली हाथ राजस्थान से लौटना पड़ गया था। हर साल 10-12 लोग आते थे लेकिन अब हम सिर्फ तीन जने आ रहे हैं। उन्होंने कहा 30 वर्षों से हम लोग यहां आ रहे हैं। पहले दादाजी भी आते थे और उसके बाद पिता और अब मैं खुद।

20 प्रतिशत भी नहीं हुई इनकम

मूर्तिकार तरुण कुंडू का कहना है कि पिछले साल बिल्कुल भी इनकम नहीं हुई थी जबकि इस बार 20 प्रतिशत तक इनकम संभव हो पाया। वैसे तो माता की मूर्ति के लिए सभी सामान राजस्थान में मिल जाता हैं लेकिन पॉली मिट्टी जो गंगा किनारे मिलती है, उसे वे लोग खुद साथ में लाते हैं।

विवाहितों का है खास त्योहार

दशमी पर विवाहिता सिंदूर खेला की रस्म भी घर में ही करेगी। बंगाली समाज शहर में 35-40 परिवार बरसों से सामूहिक पूजा में शामिल होते हैं, जहां 1997 में सबसे पहले पद्मिनी पार्क में शुरुआत हुई थी। तब सिर्फ मूर्ति पूजा की थी। अगले साल 1998 में गाडीलोहार स्कूल और बाद में रेलवे स्टेशन स्थित आशीर्वाद वाटिका में पांच दिवसीय महोत्सव होने लगा। अध्यक्ष अमित चक्रवर्ती ने बताया कि हमने धीरे-धीरे सभी होटलों में जाकर इनवाइट करना शुरू किया था। यहां आने वाले हर बंगालियों को मां के दर्शन हो पाए और वह पूजा में शामिल हो पाए। उन्होंने अस्पताल में अष्टमी के दिन फल 20 बिस्किट वितरण करना भी शुरू किया।

पुजारी भी आते थे बंगाल से

अमित चक्रवर्ती का कहना है कि अष्टमी की संधी पूजा के बाद कद्दू जैसे दिखने वाले चालकुमरो की बलि दी जाती थी। नवमी की पूजा होती थी और रोज धुनि डांस का धूम होता था। उन्होंने बताया कि पंडित भी बंगाली होते हैं। मूलतः वह बांकुड़ा के रहने वाले हैं लेकिन अभी वह झुंझुनू में रहते हैं। शांतिमयी चक्रवर्ती और उनके भाई बरसो से यहां पूजा करवाते है।

इस तरह की मूर्तियां बनाई जाती है, जिसके लिए बंगाल से कारीगर आते हैं। (फ़ाइल फ़ोटो)
इस तरह की मूर्तियां बनाई जाती है, जिसके लिए बंगाल से कारीगर आते हैं। (फ़ाइल फ़ोटो)
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