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  • Dungla Is The First Town In The State Where The Tradition Of Keeping The Market Closed For Eight Days Of Paryushan For 55 Years, It Did Not Break Even During The Period.

पर्युषण में धार्मिक अवकाश पर जैन समाज:डूंगला प्रदेश का ऐसा पहला कस्बा जहां पर्युषण के आठ दिन बाजार बंद रखने की 55 साल से परंपरा, यह काेराेनाकाल में भी नहीं टूटी

डूंगला18 दिन पहलेलेखक: राजेंद्र मोगरा
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डूंगला में पर्युषण पर्व के दौरान सोमवार को बाजार में पसरा सन्नाटा। - Dainik Bhaskar
डूंगला में पर्युषण पर्व के दौरान सोमवार को बाजार में पसरा सन्नाटा।
  • इस दौरान 10 करोड़ के कारोबार वाली 700 दुकानें, मिल सब बंद
  • 325 जैन परिवार व्यापार काे पूरी तरह से बंद रखते हैं, आसपास के 60 गांवों से खरीदार भी नहीं आते हैं

राजस्थान में पाली के बाद चित्तौड़गढ़ जिले का डूंगला ही दूसरा ऐसा उदाहरण है, जहां पर्युषण के 8 दिन बाजार सूने रहते हैं। पाली तो शहर है, कस्बे की बात करें तो डूंगला प्रदेश में दुर्लभ है, जहां सभी करीब 325 जैन परिवार पर्युषण में व्यापार करने का पूर्ण प्रत्याख्यान रखते हैं। वे इसकी जगह आगम आराधना करते हैं। इससे करीब 10 करोड़ का कारोबार प्रभावित होगा।

डूंगला तहसील मुख्यालय का करीब 90 प्रतिशत व्यापार-व्यवसाय जिस जैन समाज के पास है, वह 4 से 11 सितंबर तक धार्मिक अवकाश पर है। यह परंपरा 55 साल से चल रही है, जो कोरोनाकाल में लगातार दो साल के लंबे लॉकडाउन से हुए घाटे के बाद भी नहीं टूटी। अभी साध्वी श्री विरक्ता आदि ठाणा 3 के चातुर्मास में भी पहले दिन शुक्रवार से सभी ने दुकान, व्यवसायिक परिसरों पर 8 दिन के लिए ताला लगाकर कर्मचारियों को भी छुट्टी दे रखी है। कस्बे में कृषि जिंस, ऑयल मिल, रेडिमेड, ज्वैलरी आदि व्यापार पूरी तरह बंद हो गए। कपड़े की 80 और किराना-जनरल की 50 प्रतिशत दुकानें भी बंद हैं। अकेले इन्हीं सबका प्रतिदिन औसत 1 से सवा करोड़ का टर्नओवर है। हालांकि अब अन्य समाजों के पास भी व्यापार-व्यवसाय है पर निकटवर्ती 50-60 गांवों के लोग व किसान भी पर्युषण के दौरान खरीद-बिक्री के लिए कस्बे में नहीं आते हैं। क्योंकि बरसों पहले कस्बे का बाजार पूरी तरह बंद रहता था। आज भी सुबह 9 से 11 बजे के बीच पूरा जैन समाज जब प्रवचन में होता है, मुख्य बाजार में सन्नाटा रहता है।

दुर्लभ: इस गांव में 82 साल से हो रहा है चातुर्मास, गांव ने 10 संत-साध्वी भी दिए
जैन समाज के बड़े संत-साध्वी देशभर में प्रवचनों के दौरान कई बार डूंगला का उदाहरण रखते हैं। आज तक ग्राम पंचायत होने के बाद भी यहां 82 साल से चातुर्मास अखंडित है। पहला वर्षावास 1940 में साध्वी श्री शीलकंवर मसा का हुआ था। लगभग सभी परिवार स्थानकवासी परंपरा में जैन दिवाकर चौथमल मसा के अनुयायी होने से इसे दिवाकर नगरी भी कहते हैं। कोरोना के कारण इस साल चातुर्मास परंपरा खंडित होने के कागार पर पहुंच गई थी। करीब दो महीने पूर्व चित्तौड़गढ़ चातुर्मास के लिए जाते समय डाॅ. समकित मुनि को यह बात पता चली तो उन्होंने संघ की विनती पर अपने साथ चल रहीं 5 में से 3 साध्वियों को डूंगला चातुर्मास के लिए रोक दिया। अब तक कई प्रमुख संतों के आगमन और धर्म के प्रति गहरा लगाव ही है कि इस गांव के 10 अनुयायी स्वयं दीक्षा लेकर कठोर संयम मार्ग पर अग्रसर हो चुके हैं। उप प्रवर्तनीय सज्जन कंवर का 2012 से 21 तक 12 साल डूंगला में स्थिरवास भी रहा।

हर परिवार को देते हैं आयंबिल का नारियल
जैन दर्शन में आयंबिल अनूठा दृढ संयम व संकल्पी तप है। डूंगला में रोज एक आयंबिल की परंपरा 58 साल पहले उप प्रवर्तनी सज्जन कंवर की प्रेरणा से शुरू हुई थी, जो कायम है। जिस दिन जिस परिवार को आयंबिल करना है, उसके पास एक दिन पूर्व नारियल पहुंचा दिया जाता है। मतलब कल घर के किसी एक सदस्य को आयंबिल करना है। हर आसोज एवं चेत्र शुक्ल पक्ष में ओली तप भी मनाते हैं।

ये डूंगला के रहने वाले बने जैन संत-साध्वी

  • उपाध्याय प्यारचंदजी (नागौरी परिवार)
  • रंग मुनिजी (नागौरी परिवार)
  • साध्वी सोहन कंवर (मेहता परिवार)
  • साध्वी प्रेम कंवर (मेहता परिवार)
  • कमल मुनि कमलेश (नागौरी परिवार)
  • चंद्रेश मुनि (नागौरी परिवार)
  • साध्वी प्रियदर्शना (तातेड़ परिवार)
  • साध्वी पुष्पाजी (तातेड़ परिवार)
  • साध्वी मुक्तिप्रभा (दाणी परिवार)
  • साध्वी सुमन प्रभा (दक परिवार से)
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