देश में कोयले की कमी से बिजली संकट में:मांग की 20% साेलर से बना रहे, तीन कंपनी सरकार को भी बेच रही बिजली

भीलवाड़ा2 महीने पहले
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पावर ऑफ टेक्सटाइल सिटी 100 फैक्ट्रियों में प्लांट - Dainik Bhaskar
पावर ऑफ टेक्सटाइल सिटी 100 फैक्ट्रियों में प्लांट

देश में चल रहे बिजली संकट के बीच भीलवाड़ा औद्याेगिक साैर शक्ति का नया हब बनकर उभर रहा है। टेक्सटाइल सिटी काे अभी औद्याेगिक कटाैती का सामना नहीं करना पड़ रहा है ताे इसकी वजह है साैर बिजली का उत्पादन। जिला अपनी औद्याेगिक जरूरत का करीब 20 प्रतिशत उत्पादन सूरज की किरणाें से कर रहा है।

विशेषज्ञाें का कहना है कि जिले में साैर बिजली की संभावनाएं भी काफी है। यहां की भाैगाेलिक स्थिति इसे साेलर हब बनाने के लिए काफी अनुकूल हैं। गुलाबपुरा के पास आंगूचा में स्थित एशिया की सबसे बड़ी हिंदुस्तान जिंक की ओपन माइंस में वेस्ट डंप में 120 मीटर ऊंचाई पर साैर ऊर्जा प्लांट लगा है। कचरे के ढेर पर इतनी ऊंचाई पर लगे प्रदेश के इस पहले प्लांट में 22 मेगावाट बिजली राेज बन रही है।

यह इस खदान की 40 प्रतिशत जरूरत जितनी है। जिले में अन्य प्लांट काे भी शामिल कर लें ताे हमारा साैर ऊर्जा उत्पादन 128 मेगावाट यानि 6 लाख यूनिट से ज्यादा प्रतिदिन है। यह हर दिन की मांग 32 लाख यूनिट का करीब 20 फीसदी है। यहां तीन कंपनी संगम ग्रुप, नीतिन स्पीनर्स व आरएसडब्लूएम ने अपने थर्मल प्लांट लगाए थे लेकिन काेयले की कमी से बंद पड़े हैं।

बिजली निगम के एक्सईएन राजपालसिंह का कहना है कि शाहपुरा व गुलाबपुरा में दस-दस मेगावाट व गंगापुर में पांच मेगवाट क्षमता के कॅमर्शियल प्लांट लगे हैं। ये कंपनियां प्रसारण निगम काे बिजली बेच रही हैं।

अभी 18%, लेकिन 10 साल में 63% साैर बिजली राज्य में बनेगी

अभी प्रदेश में 9.6 गीगावाट बिजली उत्पादन हाे रहा है। पिछले वर्ष में 1.7 गीगावाट के नए प्लांट शुरू हुए। ये देश में सबसे ज्यादा हैं। यही रफ्तार रहने पर राजस्थान में दस साल में 63 प्रतिशत तक अक्षय ऊर्जा का उत्पादन हाेने लगेगा। अभी 57 प्रतिशत काेयले, 18 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा से बिजली बन रही है।

बड़ी समस्या महंगी सरकारी बिजली

भीलवाड़ा में उद्याेगाें काे अन्य राज्याें की तुलना में महंगी बिजली मिलती है। ऐसे में उद्यमी साैर ऊर्जा अपना रहे हैं। अभी 100 से ज्यादा कपड़ा फैक्ट्रियाें में 95 मेगावाट से ज्यादा के प्लांट लग चुके हैं। उद्याेगाें काे मिलने वाली बिजली साढ़े 8 रुपए प्रति यूनिट है जबकि साैर ऊर्जा से बिजली की लागत करीब साढ़े चार रुपए ही आती है। ऐसे में कुल 128 मेगावाट के साेलर प्लांट लगे हैं। जिले में सूर्य की किरणें सर्वाधिक समय 4-6 घंटे सीधे पड़ती हैं।

दाे पैमाने बदलें ताे मिले फायदा

1 राजस्थान में फैक्ट्री कैपेसिटी का 72 प्रतिशत की साैर ऊर्जा प्लांट लगा सकते हैं जबकि गुजरात में साै प्रतिशत है। ऐसा किया जाए ताे साैर ऊर्जा का प्राॅडक्शन बढ़ सकता है।

2 दिसंबर 2019 की साेलर पाॅलिसी में स्पष्ट था की रूफटाॅफ साेलर पर सात साल तक इलेक्ट्रीसिटी ड्यूटी नहीं देनी पड़ेगी। जबकि सरकार ने एक अप्रैल 2020 से 60 पैसा प्रति यूनिट चार्ज वसूलना शुरू कर कर दिया है। इसे खत्म करना जरूरी है।​​​​​​​

बिजली की खपत 24 घंटे हैं लेकिन साैर ऊर्जा से बिजली उत्पादन चार से पांच घंटे ही हाेता है। अभी करीब छह लाख यूनिट राेजाना साेलर प्राेजेक्ट से बिजली बन रही है। इसमें दिनाेंदिन लाेगाें का रुझान बढ़ रहा है। कपड़ा फैक्ट्रियाें में भी करीब 100 मेगावाट के प्लांट लग गए हैं। इसमें सरकार यदि पाॅलिसी में थाेड़ा बदलाव करे ताे साेलर में निवेश और बढ़ सकता है। रमेश अग्रवाल, साैर बिजली व टेक्सटाइल उद्यमी​​​​​​​

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