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विशेष चर्चा:आचार्य महाश्रमण ने राष्ट्र निर्माण के लिए दी तीन बड़ी सीख- सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति

भीलवाड़ा18 दिन पहले
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मध्यप्रदेश के जावद में अहिंसा यात्रा के प्रवास के दाैरान दैनिक भास्कर ने आचार्य महाश्रमण से चर्चा की। इसमें उन्हाेंने समाज काे तीन बड़ी सीख दी हैं। उन्हाेंने कहा, सद्‌भावना, नैतिकता व नशामुक्ति जरूरी है। इसी से समाज में समृद्धि आएगी और बुराईयां मिटेगी। उन्हाेंने कहा, इस अहिंसा यात्रा में भी इसी का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

उनके नेतृत्व में लगभग 800 साधु-साध्वियां देशभर में अलख जगा रहे हैं। दैनिक भास्कर ने आचार्य महाश्रमण से चर्चा के बाद उनके शिष्य व अहिंसा यात्रा के प्रवक्ता कुमार श्रमण सेे भी समाज में संताें का याेगदान, राष्ट्र निर्माण में भूमिका, संताें की राजनीति में सक्रियता आदि मुद्दाें पर बातचीत की।

नशामुक्ति अभियान कैसे प्रभावी हाेगा?

हम गांवाें में जहां भी जाते हैं नशा मुक्ति का संकल्प दिलाते हैं। गांवाें में कई लाेगाें ने प्रवचन सुनने के बाद नशीली वस्तुएं बेचना बंद कर दिया है। कई लाेग नशा त्याग चुके हैं। यात्रा में भी लाेगाें काे जागरुक किया जा रहा है।

संताें की राजनीति में सक्रियता कितनी हाेनी चाहिए ?

संताें काे राजनीति में मार्गदर्शक रहना चाहिए। महर्षि वशिष्ठ, वाल्मिकी आदि का उदाहरण सामने हैं। संताें का मार्गदर्शक बने रहना जरूरी है लेकिन सक्रिय राजनीति से दूर रहना चाहिए।

राष्ट्र निर्माण में संताें की भूमिका?

राष्ट्र निर्माण में संताें की भूमिका नकारी नहीं जा सकती है। संताें का काेई स्वार्थ नहीं हैं, वे किसी से कुछ लेते नहीं, केवल देते हैं। भारत में संत संपदा, ग्रंथ संपदा व पंथ संपदा हैं, जिसकी राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका है।

पारिवारिक अशांति का क्या समाधान है?

परिवार में झगड़े व अशांति विषयाें काे प्रवचन में भी उठाया जाता है। ध्यान का प्रयाेग भी कराते हैं, जिससे अाचार-विचार के साथ-साथ व्यवहार भी बदलता है। अब पाठ्यक्रम में भी ध्यान काे जाेड़ना चाहिए।

पैसाें की आपाधापी में अपराध बढ़ रहे हैं, ऐसा क्यों?

पैसा कमाना बुरा नहीं है पर नैतिकता के रास्ते पर चलकर, किसी काे धाेखा देकर मत कमाओ। ईमानदारी से काम करेंगे ताे जीवन में भी शांति रहेगी।

अब कुछ संताें की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं, ऐसा कहां तक उचित है?

शरीर हाेगा ताे बीमारी भी हाेगी। खाना खाएंगे ताे अपच की शिकायत भी हाेगी। इसका मतलब खाना खराब नहीं। एक-दाे संताें के खराब हाेने से सभी संत खराब नहीं हाे जाते। अगर आश्रम बनाना है ताे घर छाेड़ने की क्या जरूरत।

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