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नया प्रयोग:प्रदेश में पहला मामला; सेल्फोस खाने वाली 16 साल की बच्ची की ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन प्रक्रिया से बचाई जान

भीलवाड़ा13 दिन पहले
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  • मां ने डांटा ताे 16 साल की बच्ची ने खा लिया सेल्फाॅस, दाे-ढाई घंटे बाद गंभीर हालत में परिजन अस्पताल लेकर पहुंचे
  • 24 दिन बच्ची अस्पताल में भर्ती रहने के बाद स्वस्थ हाे गई

ज्यादातर देखने में आता है कि सेल्फोस खाने वाले की जान चली जाती है। कुछ मामलाें में ही ऐसे व्यक्ति की जान बच पाती है। वाे व्यक्ति ऐसे हाेते हैं जिनके शरीर में या ताे सेल्फोस की मात्रा कम हाेती है या फिर से समय पर इलाज मिल जाता है। प्रदेश में यह पहला मामला है जहां सेल्फोस खाने के करीब दाे से ढ़ाई घंटे बाद मरीज काे अस्पताल लाया गया और डाॅक्टराें की किसी विशेष तकनीक के जरीए उसकी जान बचाई है। यह विशेष तकनीक ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन है।

यह मामला एमजी अस्पताल का है, जहां इस विशेष तकनीक से ऐसी 16 वर्ष की बालिका की जान बचाई गई जिसने अस्पताल पहुंचने से करीब दाे-ढाई घंटा पहले सेल्फोस खा लिया था। इस बालिका की जान बचाने के लिए एमजी अस्पताल के डाॅ. जगदीश साेलंकी व उनकी टीम ने इस विशेष तकनीक का इस्तेमाल किया।

महिला एवं बाल चिकित्सा इकाई की प्रभारी डाॅ. इंद्रा सिंह ने बताया कि आंबेडकर काॅलाेनी निवासी तपन विश्वास की 16 साल की बेटी नीतू विश्वास काे मां ने डांटा ताे गुस्से में आकर घर में रखी सेल्फोस की गाेली खा ली। 12 मार्च दाेपहर 2 बजे परिजन एमजी अस्पताल के महिला एवं बाल चिकित्सा इकाई में लेकर आए।

जहां पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट के इंजार्च जगदीश साेलंकी ने नीतू काे देखकर उपचार शुरू कर दिया। उपचार शुरू करने के बाद भी जहर का असर कम नहीं हुआ। बीपी कम हाे गया, बेचैनी हाेने के साथ ही बेहाेश हाेने लगी। थाेड़ी देर तक और देखा फिर ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन तकनीक अपनाने के लिए डाॅक्टराें की टीम से सलाह ली। इसके बाद पीएमओ डाॅ. अरुण गाैड़ काे इस तकनीक के बारे में बताया। इसके बाद डाॅ. गाैड़ ने अनुमति दे दी। बच्ची काे 24 दिन भर्ती रहने के बाद पूरी तरह से स्वस्थ्य हाेने पर छूट्टी दे गई।

नीतू की मां तानिया विश्वास ने कहा परीक्षा आने वाली है ताे मोबाइल नहीं देखने काे लेकर शिवरात्रि के दिन डांट दिया था, इस पर उसने डेढ़ गाेली खा ली। (रूआंसे गले से बाेली) इन डाॅक्टराें ने मेहनत कर बच्ची की जान बचाई है। इन डॉक्टर लाेगाें काे धन्यवाद देना चाहती हूं जिनके कारण आज बच्ची मेरे साथ हैैैैै।

आगे भी जाे मरीज यहां पर आए डाॅक्टराें काे स्पाेर्ट करें इन से लड़ाई-झगड़ा नहीं करें। सब बच्चाें काे कहना चाहती हूं कि ऐसी काेई हरकत नहीं करें जिससे माता-पिता काे परेशानी का सामना करना पड़े। {इस टीम ने दिया जीवन दान... डाॅ. इंद्रा सिंह, डाॅ. जगदीश साेलंकी, डाॅ. सरिता काबरा, डाॅ. दाैलत मीणा, डाॅ. कुलदीप सिंह, डाॅ. शैतान सिंह, डाॅ. गाैरव कुमार की टीम ने 24 दिन तक बच्ची का उपचार किया। साथ मेडिकल आईसीयू व पीडियाट्रिक आईसीयू के स्टाॅफ का भी सहयाेग रहा।

दस यूनिट खराब खून निकाला और इतना ही फ्रेश ब्लड बालिका को चढ़ाया
क्या है ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन...एमजी अस्पताल के फिजिशियन डाॅ. दाैलत मीणा ने बताया कि ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन तकनीक में एक तरफ से खराब यानी जहरीला खून निकाला गया। वहीं दूसरी तरह से फ्रेश खून चढ़ाया गया। इस बच्ची की गले की नस से फ्रेश ब्लड लगाया और पांव की फीमाेरल आर्टरी से विषाक्त खून निकाला गया।

दाे दिन में 10 यूनिट खराब खून निकाला और फ्रेश खून चढ़ाया है। इससे धीरे-धीरे सुधार हाेने लगा। डाॅ. मीणा ने बताया कि बच्ची काे ब्लड रक्तदाता विक्रम दाधीच ने उपलब्ध करवाया है। उनकाे सूचना मिलते ही टीम के साथ रक्तदान किया और बच्ची के लिए ब्लड उपलब्ध करवाया है।

सकारात्मक उम्मीद के साथ उपचार किया ताे सफलता मिल गई: साेलंकी
दाेपहर में 2 बजे परिजन बच्ची काे लेकर आए तब हालात गंभीर थी, तुरंत उपचार शुरू किया। बच्ची की बीपी कम हाेने लगी और बेहोशी जैसी हालत हाे गई। उपचार के बाद भी सुधार नहीं हुआ ताे टीम काे बताया कि 2006 में मेथेमोग्लोबिनेमिया बीमारी में सउदी अरब में नाैकरी के दाैरान ब्लड एक्सचेंज ट्रांसफ्यूजन तकनीक से 3 साल की बच्ची का उपचार किया था। जिससे बच्ची बच गई। इस पर डॉक्टर्स इस तकनीक काे अपनाने काे राजी हाे गए।

इसके बारे पीएमओ डाॅ. अरुण गाैड़ काे बताया ताे उन्होंने भी अनुमति दे दी। इसके बाद उपचार शुरू किया और दाे दिन तक 10 यूनिट खराब खून निकाला और फ्रेश खून चढ़ाया। आत्म विश्वास और सकारात्मक उम्मीद रखते हुए उपचार किया और सफलता मिल गई और बच्ची की जान बच गई।
जगदीश साेलंकी, इंचार्ज, पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट

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