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  • First Of All, Know The Story Of The First Tricolor Hoisted In The City In Bhaskar And The Sacrifice Of Bhilwara In Andelan, The Britishers Held India 78 Years Ago.

अनछुए पहलू:सबसे पहले भास्कर में जानिए शहर में फहराए पहले तिरंगे की कहानी और 78 साल पहले हुए अंग्रेजाें भारत छाेड़ाे आंदाेलन में भीलवाड़ा का याेगदान

भीलवाड़ाएक महीने पहले
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  • बड़े मंदिर की बगीची में लहराया था 15 अगस्त 1947 को राष्ट्रध्वज, सेवा सदन स्कूल था, अब नया निर्माण हो चुका
  • आठ लोगों काे पुलिस उदयपुर ले गई, वहां झंडा फहराया तो पीटा लेकिन माफी नहीं मांगी थी

देश आजाद हाेने पर 15 अगस्त 1947 काे भीलवाड़ा में पहला तिरंगा झंडा बड़े मंदिर की बगीची में फहराया था। तब सेवा सदन स्कूल यहीं संचालित था। 8 छात्र पढ़ते थे। पुराने शहर में बड़ा मंदिर के पीछे ही एक जगह थी जिसे बगीची कहते थे। वहां झंडा फहराते वक्त स्वतंत्रता सेनानी हुकमीचंद सुराणा, रमेशचंद्र व्यास, भंवरलाल भदादा, रूपलाल साेमानी, केसरपुरी गाेस्वामी, भगतरात ताेषनीवाल सहित कई गणमान्य शामिल हुए। बगीची के स्थान पर अब नया निर्माण हाे चुका है। - कंटेंट| नरेंद्र जाट

सन 1942 में 9 अगस्त काे अंग्रेजाें भारत छाेड़ाे आंदाेलन शुरू हुआ। मेवाड़ प्रजामंडल कार्यसमिति की विशेष सभा हुई। इसमें तय किया कि 22 अगस्त काे उदयपुर में हाेने वाली प्रतिनिधि सभा में काेई शरीक नहीं हाेगा। क्याेंकि अंग्रेज उसी दिन सब काे गिरफ्तार करने की याेजना बना रहे थे। एक साथ गिरफ्तारी हाेने पर आंदाेलन का विस्तार मेवाड़ में नहीं हाे सकेगा।

याेजना के अनुसार भीलवाड़ा से सभा में काेई नहीं गया। प्रतिनिधि सभा समाप्त हाेते ही अंग्रेजाें ने कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी शुरू कर दी। सभी काे जेल भेज दिया और प्रजामंडल पर प्रतिबंध लगा दिया। तब मैं भीलवाड़ा में साथियाें से मिला। उस वक्त उनमें उत्साह था लेकिन बाद में कुछ ने त्याग पत्र भेज दिए।

तब बाबू हुकमीचंद सुराणा, केसरपुरी गाेस्वामी, वैद्य रामचंद्र ब्रह्मचारी और मैं आंदाेलन पर विचार विमर्श के लिए एक मित्र के मकान पर मिले। सबकी राय थी कि मुझे ही सबसे पहले सत्याग्रह करना है। भीलवाड़ा में आंदाेलन की शुरुआत के लिए बड़ा मंदिर चाैक में 27 अगस्त काे बड़ी संख्या में लाेग इकट्ठे हुए। मैंने आंदाेलन के बारे में लाेगाें काे बताया। सभा के बाद जुलूस निकला जाे बाजार में हाेते हुए स्टेशन तक पहुंचा।

तत्कालीन कलेक्टर मदनलाल राठी का संदेश लेकर एक कर्मचारी मेरे घर गया। उसने कहा कि आंदाेलन की आपकाे छूट है लेकिन सभा मत कीजिए। 27 अगस्त काे मुझे वैद्य रामचंद्र ब्रह्मचारी, मिश्रीलाल गाेयल, प्रभुलाल बिड़ला काे आधी रात काे गिरफ्तार कर लिया। हमें उदयपुर केंद्रीय कारागृह भिजवा दिया। इस प्रकार आंदाेलन मेवाड़ में फैल गया। एक महीने बाद 30 प्रमुख साथियाें काे पुलिस निगरानी में हल्दीघाटी के पास इसवाल के महल में नजरबंद कर दिया। खिड़कियाें से हवा आने के लिए केवल आठ-दस इंच की जगह रखी गई थी।

यहां पर भीलवाड़ा के 7 साथी मेरे अलावा मानिकलाल नुवाल, वैद्य रामचंद्र ब्रह्मचारी, कवि भंवरलाल स्वर्णकार, गाेकुल धाकड़, मथुराप्रसाद वैद्य, मिश्रीलाल गाेयल थे। माणिक्यलाल वर्मा पहले से जेल में थे। जेल में हमने झंडाभिवादन कार्यक्रम तय किया। सभी साथी माणिक्यलाल वर्मा काे घेरकर खड़े हाे गए।

ज्याें ही वर्माजी ने झंडा फहराया पुलिस उसे छीनने के लिए टूट पड़ी। सब गुत्थम गुत्था हुए। कई काे चाेट आई लेकिन झंडा पुलिस के हाथ नहीं लगने दिया। हमें 13 अगस्त 1943 काे जेल से मुक्त किया गया। पुलिस माफी मांगने की कहती रही। हममें से काेई नहीं झुका। - जैसा स्वतंत्रता सेनानी रूपलाल साेमानी ने आत्मकथा में जिक्र किया है

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