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राहत:बजरी का विकल्प बनेगी क्रेशर डस्ट; इसी महीने मंजूरी,चिनाई में ज्यादा मजबूत, कीमत भी आधी

भीलवाड़ा3 महीने पहले
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  • दिसंबर तक नई खनिज नीति काे मंजूरी, क्रेशर डस्ट में होते हैं बजरी जैसे ही गुण

क्रेशर डस्ट बजरी का विकल्प बन सकती है। बजरी खनन पर रोक के बाद बजरी की आपूर्ति को लेकर प्रदेश में खड़े हुए संकट को क्रेशर डस्ट (मेनुफेक्चरिंग सैंड) या कृत्रिम रेत से खत्म किए जाने पर विभागीय स्तर पर पॉलिसी तैयार हाे चुकी है। एक्सपर्ट क्रेशर डस्ट काे बजरी का बेहतर विकल्प मान रहे हैं। उनका कहना है कि क्रेशर डस्ट नदी की बजरी से ज्यादा मजबूत भी है।

एक्सपर्ट के अनुसार बड़े पत्थरों के ब्लॉक्स की कटिंग के बाद बचने वाले छोटे-छोटे टुकड़ों को क्रेशर में चूरे की तरह पीस कर डस्ट तैयार की जाती है। इसको बजरी की जगह काम में लिया जा सकता है। एक्सपर्ट के अनुसार बजरी की अपेक्षा क्रेशर डस्ट की दरें भी कम होगी। कई जिलों की खदानाें में खनन से मिनरल निकलने के बाद बचे अपशिष्ट के पहाड़ खड़े हो गए हैं।

अगर इस अपशिष्ट को डस्ट में तब्दील कर दिया जाए तो बजरी की समस्या खत्म हो सकती है। जानकाराें का कहना है कि बजरी की समस्या के समाधान के लिए राज्य सरकार जल्द पॉलिसी काे मंजूरी दे सकती है।

नाॅलेज : अवैध बजरी खनन करके 2500 रुपए ले रहे ट्रॉली के, डस्ट के 700 तक ही

रासायनिक स्तर पर देखा जाए तो बजरी नेचुरल प्रोसेस से तैयार होती है और डस्ट मशीन से। इसके गुणों में किसी प्रकार का अंतर नहीं है केवल संरचना में अंतर है। बजरी में गोल कण के साथ डस्ट होती है जबकि स्टोन क्रेशर डस्ट में कण नुकीले व तीखे होते हैं। निर्माण कार्याें से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाई के काम में स्टोन डस्ट बजरी के मुकाबले अधिक प्रभावी है लेकोोिन प्लास्टर के काम में थोड़ी कठिनाई आती है।

एक अनुमान के अनुसार शहर में पांच सौ से अधिक ट्रैक्टर बजरी की प्रति दिन खपत हो जाती थी। एक ट्रैक्टर ट्रॉली बजरी के सामान्य दिनों में करीब 1,500 रुपए लगते थे जबकि इन दिनों हो रहे अवैध बजरी खनन के कारण एक ट्रॉली की कीमत करीब 2,500 से तीन हजार रुपए वसूल की जा रही है। जबकि क्रेशर डस्ट की एक ट्रॉली 500 से 700 रुपए में उपलब्ध है। इससे फायदा मिलेगा।

ऐसे ही बजरी का दोहन होता रहा तो 20 साल में खत्म हो जाएगी...जिले की नदियों में बजरी दोहन लगातार बढ़ रहा है। इससे नदियों के आसपास के कुएं, तालाब आदि रिचार्ज नहीं हो रहे हैं। इसका असर सिंचाई पर होगा। जानकारों के मुताबिक ऐसे ही बजरी दोहन होता रहा तो आने वाले 20 साल में नदियों में से बजरी खत्म हो जाएगी।

संभावना इसलिए दिल्ली-कर्नाटक में क्रेशर डस्ट का उपयोग... अन्य प्रदेशों जैसे दिल्ली और कर्नाटक में पत्थरों का चूरा बनाकर क्रेशर डस्ट बनाई जा रही है और उसका उपयोग निर्माण कार्यों में भी होने लगा है। कर्नाटक में लगभग 450 रुपए प्रति टन के हिसाब से इसका निर्माण हो रहा है। कर्नाटक में बजरी की कमी के चलते बाहर से बजरी मंगाई जाती थी। अन्य राज्यों के अलावा यहां थाइलैंड से भी बजरी का इंपोर्ट होता था, लेकिन क्रेशर डस्ट (मैन्युफैक्चरिंग सेंड) के चलन के बाद लोगों को बाहर से आ रही महंगी बजरी की जगह यह विकल्प काफी रास आ रहा है।

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