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वैज्ञानिक रिसर्च:ऊंटनी के दूध पर वैज्ञानिक रिसर्च की भरमार पर जमीन पर काम शून्य, ना ऊंटनी का उपयोग ना उसके दूध का

बीकानेरएक दिन पहले
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1982 में ऊंट की संख्या 8 लाख के करीब थी और अब घटकर राजस्थान में ढाई लाख के करीब रह गई। ऊंट को बचाने के लिए वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इसे राज्य पशु घोषित किया था ताकि इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए नीति बने और जमीन पर काम हो लेकिन राज्य पशु कागजों में घोषित होने के बाद आज तक न तो उसके लिए कोई पॉलिसी आई और ना ही जमीन पर काम हुआ।

नतीजा ऊंटों की संख्या लगातार गिरती जा रही है। यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं जब ऊंट भी चिड़ियाघर में देखे जाएंगे। ऊंट पर किसान अब कम आश्रित होने लगे हैं इसीलिए इसे दूध के आधार पर बनाए रखने की कोशिश लगातार जारी है। वैज्ञानिक ऊंटनी के दूध पर अनुसंधान पर अनुसंधान किए जा रहे हैं।

हाल ही में सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन कैटल मेरठ में एक ऐसी मशीन बनाई है जिससे ऊंटनी के दूध में अगर 100 ग्राम भी पानी या अन्य पशु का दूध मिलाया गया तो वह 5 मिनट में पता लगा लेगी। मशीन की कीमत 5 लाख और अगर फुटकर में कोई दूध चेक कराना चाहता है तो 50 से ₹100 की कीमत है। वैज्ञानिकों ने यह मशीन इसलिए बनाई ताकि ऊंटनी का दूध के आधार पर कोई बड़ा प्रोजेक्ट या प्रोडक्ट बनाना चाहता है तो उसके काम यह मशीन आएगी।

अब अस्थमा में भी काम आता है ऊंटनी का दूध

कोविड-19 के दौर में अस्थमा रोगियों के लिए कोरोनावायरस खतरनाक है ऐसे में ऊंटनी का दूध अस्थमा रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है इसके अलावा डायबिटीज और अति मंदबुद्धि बच्चों को भी ठीक करने में यह मददगार है इसका अनुसंधान भी वैज्ञानिक कर चुके हैं बावजूद इसके ऊंटनी के दूध का न तो कोई सेंटर है और ना ही सरकार ने कोई प्रोत्साहन स्वरूप प्लांट लगाया। यही वजह है कि इतने बड़े स्तर पर ऊंटनी के दूध का कोई उपयोग नहीं हो पा रहा।

ऊंट जिस दौर से गुजर रहा है उससे लगता है कि आने वाली सदी में ऊंट चिड़ियाघर में ही देखे जाएंगे। कागजों में बहुत सारी पॉलिसी बनती हैं लेकिन धरातल पर काम नहीं दिख रहा। एक जानी-मानी दूध की कंपनी ने ऊंटनी के दूध से चॉकलेट बनाई और प्रधानमंत्री से उसका शुभारंभ कराया लेकिन उसके बाद काम बंद हो गया। राजस्थान में राज्य पशु घोषित किया गया लेकिन उसके दूध के मार्केट को लेकर सरकार की ओर से अभी तक कोई कदम दिखाई नहीं दिया।
एन. वी. पाटील, पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय उष्ट्र अनुसंधान संस्थान बीकानेर

अकेले राजस्थान में करीब 4 लाख लीटर उत्पादन होता है ऊंटनी का दूध

अकेले राजस्थान में ऊंटनी का दूध करीब चार लाख लीटर उत्पादन होता है लेकिन इसकी वैल्यू अभी तक न तो सरकार ने समझी और ना ही किसानों ने। प्रदेश का एकमात्र जैसलमेर जिला है जहां एक संस्था प्रतिदिन 200 से 300 लीटर दूध बेचती है। यहां से कुछ दूध बाहर की कंपनियां भी ले जाती हैं लेकिन शेष 32 जिलों में ऊंटनी के दूध पर कहीं काम नहीं हो रहा है। प्रदेश में अब ऊंटों की संख्या करीब ढाई लाख बची है जिसमें से 50% ऊंटनी है।

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