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बच्चों के लिए मोबाइल कितना घातक इन केस से समझिए:पहला- गेम खेलने से रोका तो घर में आग लगा दी, दूसरा- पिता की जेब से रुपए चोरी करने लगा, तीसरा-बात-बात पर गुस्साने लगा

बीकानेर8 महीने पहलेलेखक: जयभगवान उपाध्याय
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फोटो : मनीष पारीक - Dainik Bhaskar
फोटो : मनीष पारीक

क्या आपका बच्चा भी घंटों तक मोबाइल गेम खेलते रहता है। या उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, निराशा, तनाव, उग्रता या एकाकीपन के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। अगर हां तो उसे मनोचिकित्सक को दिखाने की जरूरत है। जी हां बीकानेर में भी मोबाइल गेम की लत के शिकार बच्चों की संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है। मोबाइल लत के कारण प्री स्कूल के बच्चों का शारीरिक व मानसिक विकास थम रहा है। पढऩे-लिखने की उम्र में वे गलत दिशा की ओर जा रहे हैं।

नागौर के लाडनूं में अपने चचेरे भाई की हत्या करने वाला युवक भी मोबाइल गेम का आदी था। दैनिक भास्कर टीम ने मंगलवार को मोबाइल गेम के आदी युवाओं की ट्रैवल हिस्ट्री खंगाली तो हैरान करने वाली बातें सामने आई। अकेले पीबीएम हॉस्पिटल में पिछले दो साल में मोबाइल एडिक्शन के शिकार करीब आठ हजार बच्चों-युवाओं ने मनोचिकित्सक को दिखाकर मोबाइल लत से पीछा छुड़ाने की दवाइयां ली है। डॉक्टरों की मानें तो लॉक डान में ऐसे मरीजों की संख्या में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। पीबीएम में रोजाना 10-12 अभिभावक मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टरों के पास पहुंच रहे हैं, जो अपने बच्चों में मोबाइल एडिक्शन से परेशान हैं।

कहानी घर-घर की

1- आठवीं कक्षा के एक विद्यार्थी को उसके परिजनों ने मोबाइल गेम खेलने से मना किया तो उसने गुस्से में घर के एक हिस्से में आग लगा दी। घबराए परिजनों ने जब बच्चे को पीबीएम हॉस्पिटल के मनोचिकित्सक को दिखाया तो इस घटना का कारण मोबाइल एडिक्शन निकलकर आया। हॉस्पिटल के डॉक्टर बच्चे की काउंसलिंग करने के बाद उसे दवाइयां देने के साथ-साथ उसकी मोबाइल लत छुड़ाने के प्रयास कर रहे हैं।

2- पबजी, फ्री फायर और ड्रैगन स्क्वायर्ड जैसे गेम की अगली स्टेप खेलने के लिए टॉपअप की जरूरत पड़ी तो पवनपुरी में रहने वाले एक सातवीं कक्षा के विद्यार्थी ने अपने पिता के मोबाइल से टॉपअप करने शुरू कर दिए। परिजनों को जब इसकी भनक लगी तो उन्होंने उसे मना किया तो उसने रुपए चुराने शुरू कर दिए। इस बच्चे का इलाज भी पीबीएम में किया जा रहा है।

3- मुक्ता प्रसाद में रहने वाला एक किशोर मोबाइल एडिक्शन का इस कदर शिकार हो चुका है कि वह देर रात अपने साथियों के साथ मोबाइल गेम खेलता है, देर से उठता है। यहां तक की उसके व्यवहार में भी पिछले एक साल में काफी परिवर्तन हो गया है। कही बात को अनसुना करने, बात-बात पर गुस्सा, नींद में झटके खाना और बोलने की शिकायत होने लगी तो परिजनों ने पीबीएम हॉस्पिटल के डॉक्टर को दिखाया। पिछले डेढ़ साल से वह मनोचिकित्सक की निगरानी में दवा ले रहा है।

  • भारतीय बाल अकादमी के सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा-देश भर में 18 साल से कम उम्र के 99.9 प्रतिशत बच्चे रोजाना मोबाइल पर दो घंटे से ज्यादा वक्त गुजारते हैं।

बच्चों में मोबाइल एडिक्शन के भयंकर दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। सबसे अधिक असर उनकी पढ़ाई पर पड़ता है। प्री-स्कूल से लेकर कॉलेज स्तर के बच्चे वीडियोगेम के शिकार हैं। उनका पढऩे में मन नहीं लगता, वे अकेलेपन, असामान्य व्यवहार, उग्रता, अवसादग्रस्त, गुस्से, देर तक जागना, देर तक सोते रहना, गुमसुम रहना, डरे, सहमे रहना तथा नशीले पदार्थों का सेवन करने के शिकार हो रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को मोबाइल निर्धारित समय तक ही दें। उनका मोबाइल बार-बार चेक करते रहें कि कहीं बच्चा मोबाइल में अनावश्यक सामग्री तो नहीं देख रहा। परिजनों की अनदेखी के चलते कई बच्चे मोबाइल गेम के साथ-साथ पोर्न फिल्में, अवसाद से बाहर निकलने के रास्तों के साथ मौत को गले लगाने जैसे आइडिया इंटरनेट पर सर्च कर रहे हैं।-प्रोफेसर डॉ. हरफूल सिंह बिश्नोई, एमडी मस्तिष्क, मानसिक रोग एवं नशा मुक्ति विशेषज्ञ पीबीएम हॉस्पिटल बीकानेर

मोबाइल का उपयोग अब विद्यार्थियों और परिजनों की दिनचर्या के साथ जुड़ गया है। इसके उपयोग को बंद नहीं किया जा सकता। लेकिन इसके अनावश्यक उपयोग को कम किया जा सकता है। रही बात विद्यार्थियों में मोबाइल एडिक्शन की तो इसके लिए परिजनों को बच्चों की चौकसी रखनी होगी। लॉकडाउन के दौरान ऑनलाइन क्लास लगीं। जो अभिभावक बच्चों को दूर रहने की सलाह देते थे, उन्हें मजबूरन नया मोबाइल खरीदकर बच्चों को देना पड़ा। भागदौड़ भरी जिंदगी में अभिभावक भी अपने बच्चों की चौकसी नहीं कर पाए। यही कारण है कि ज्यादातर बच्चे ऑनलाइन गेम और पोर्न साइटों के शिकार हो गए। अभिभावकों को चाहिए कि अपने बच्चों पर नजर रखें ताकि वे किसी गलत दिशा में नहीं जाएं। -ओम प्रकाश सारस्वत, पूर्व संयुक्त निदेशक, सदस्य राजस्थान राज्य शिक्षा नीति समिति राजस्थान सरकार

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