नवरात्र विशेष:करणी माता के जन्म से लेकर महानिर्वाण तक; हर स्वरूप की पूजा-धाम

बीकानेर15 दिन पहलेलेखक: श्याम ओझा
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करणी माता के चार बड़े मंदिरों में उनके अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन एक साथ पहली बार भास्कर में। - Dainik Bhaskar
करणी माता के चार बड़े मंदिरों में उनके अलग-अलग स्वरूपों के दर्शन एक साथ पहली बार भास्कर में।

देश के बड़े आस्था केंद्रों में से एक है देशनोक की करणी माता का मंदिर। करीब पौने पांच सौ साल पुराने इस मंदिर को चूहों वाली माताजी के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि करणी माता के आशीर्वाद से ही बीकानेर की स्थापना हुई थी। 151 वर्षों तक जीवित रहीं करणी माता ने हजारों लोगों की मदद की, गायों के लिए ओरण की स्थापना की। उनके अनुयायी पूरे देश में हैं। पहली बार नवरात्र पर भास्कर ऐसे लाखों अनुयायी के लिए करणी माता के जन्म, विवाह, तपोस्थल व महानिर्वाण वाले चारों धार्मिक स्थलों का एक साथ दर्शन करा रहा है।

सुवाप: कन्या स्वरूपा की अर्चना

जन्मस्थल- जोधपुर के फलौदी (वर्तमान में आऊ) के सुवाप गांव के मेहो चारण द्वितीय के घर पर करणी माता का जन्म 21 महीने के गर्भ के बाद संवत् 1444 में अश्विनी मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ। 29 साल तक वहीं रही। पिता, बुआ सहित आस-पास के सैकड़ों लोगों को चमत्कार दिए। संवत् 1473 में विवाह पर जन्मस्थली छोड़ी।

साठिका: तोरण धारी माता

विवाहस्थल- बीकोनर के नोखा स्थित साठिका गांव में संवत् 1473 में उनका विवाह देपाजी के साथ हुआ। शादी वाले दिन रास्ते में ही देपाजी को चमत्कार दिया। उन्हें अपना असली रूप बताकर छोटी बहन गुलाब बाई से शादी करने के लिए कहा। संवत् 1474 में बहन का विवाह देपाजी से करवा दिया। दो साल में उन्होंने साठिका का परित्याग कर दिया।

देशनोक: यहां जगदंबा स्वरूपा

तपोस्थली- बीकानेर शहर से 30 किमी दूर जहां करणी माता संवत् 1476 में आईं। वर्तमान में बने मुख्य मंदिर के अंदर स्वनिर्मित गु फा को तपोस्थली बनाया। संवत् 1594 तक यानी 118 साल तक यहां तपस्या की। देशनोक में ही नेहड़ी मंदिर में सपरिवार आवास स्थल बनाया। यहां पर गो सेवा को विशेष महत्व दिया। ओरण की स्थापना की।

धिनेरू तलाई: वरदात्री मां

महानिर्वाण- देशनोक से रवाना होकर जैसलमेर में अपनी आराध्या देवी आयड़ माता (तेमड़ाराय) के दर्शन कर करणी माता संवत् 1595 में धिनेरू तलाई पहुंचीं। यहां बीकानेर व जैसलमेर राजघराने के बीच युद्ध को शांत करने आई थीं। यहीं ज्वाला प्रकट कर करणी माता भौतिक शरीर से अदृश्य हो गईं। रिणमढ़ नाम से माता का मंदिर है।

स्रोत : स्व. ठाकुर किशोर सिंह बार्हस्पत्य लिखित श्री करणी चरित्र। रिपोर्ट : श्याम ओझा

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