राजस्थान विधानसभा की पहली महिला अध्यक्ष का इंटरव्यू:सुमित्रा सिंह बोलीं- एक छोटे से गांव में मेरा जन्म हुआ था, लेकिन मेरे पिता को मुझ पर भरोसा था

जयपुरएक वर्ष पहलेलेखक: प्रेरणा साहनी
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राजस्थान विधानसभा की पहली महिला अध्यक्ष सुमित्रा सिंह ने अपनी जिंदगी के मुश्किल समय में खुद को खड़ा किया। राजनीति में आकर मुश्किल हालात में जिंदगी काट रही महिलाओं के लिए प्रेरणा बनीं। बचपन में पिता को खो देने वाली इस बेटी को वनस्थली विद्यापीठ जैसे शिक्षा के मंदिर को जन्म देने वाला संरक्षक मिला। और फिर दुनिया बदल गई। विश्व महिला दिवस पर पढ़िए सुमित्रा सिंह की कहानी उन्हीं की जुबानी..

1931 में झुंझंनु के किसारी गांव में जन्म के 6 दिन बाद ही मेरे पिता के छाेटे भाई और स्वतंत्रता सेनानी चाैधरी लादूराम ने मुझे गोद ले लिया। एक बड़ी बहन के जन्म और फिर इकलौते भाई काे खोने के बाद जब मेरा जन्म हुआ ताे मेरी दादी बहुत रोई। तब पिता जी ने उनसे कहा कि घर में लक्ष्मी और सरस्वती आई है। खुशियां मनानी चाहिए। नामकरण संस्कार पर पंडित जी ने कहा कि मेरे भाग्य में राजयोग है। पिताजी काे मुझ पर पूरा यकीन था। प्यार से वाे मुझे साेमा बेटा बुलाते थे। क्योंकि उनकी नजरों में बेटी और बेटे में कोई फर्क नहीं था।

सोचिए,आज से लगभग नाै दशक पहले कोई पिता अपनी बेटी पर इतना यकीन कर सकता था कि 6 साल की उम्र में मुझे झुंझुनूं के छोटे से गांव से निवाई स्थित वनस्थली पढ़ने भेजा। तब न बेटी के जन्म पर खुशियां मनाई जाती थीं। न ही बेटों की तरह उन्हें उच्च शिक्षा पाने का मौका दिया जाता था। आप खुद देख सकते हैं कि पिता के बेटी पर इस यकीन के क्या मायने होते हैं।वाे भी तब जब बेटियों पर तमाम बंदिशें होती थीं। उस यकीन की मुझ पर जिम्मेदारी थी। कुछ कर गुजरने की। कुछ मिसाल छोड़ जाने की। ताकि लड़की को कोई कमजोर न समझें।

मैंने वनस्थली विद्यापीठ में बिताए 14 सालों में पढ़ने के साथ-साथ घुड़सवारी और तैराकी में महारत हासिल की। इस बीच जब मैं 9 साल की थी तब पिताजी काे जेल जाना पड़ा। जब मैं उनसे जेल में मिली ताे उन्हें देखकर मेरी आंखें भर आईं। उसी क्षण राजशाही से मुझे नफरत हाे गई। कुछ सालाें बाद टीबी के कारण जेल में ही उन्हाेंने अंतिम सांसें ली। तब अपनी दिवंगत बेटी की याद में वनस्थली की नींव रखने वाले हीरालाल शास्त्री जी ने पिताजी से किए वादे के तहत अपने स्तर पर मुझे पढ़ाया।

मैंने वनस्थली से निकलकर लड़काें के साथ ही महाराजा काॅलेज से एमए किया। फिर लड़काें के काॅलेज में ऑनरेरियम पर लेक्चरर के ताैर पर पढ़ाना शुरू किया। पं. जवाहर लाल नेहरू ने जब 15 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की बात रखी ताे किसान नेता कुंभाराम चाैधरी ने मेरा नाम सुझाया। इनसे मैं एक बार पहले मिल चुकी थी। उस दौरान मेरे ससुर चाैधरी हरदेव सिंह जी, जाे स्वयं स्वतंत्रता सेनानी थे, ने भी मेरा बहुत साथ दिया और मैंने 1957 में राजनीति में कदम रखा । यह सफर 2009 तक चला।

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